हरी सबà¥à¤œà¤¿à¤¯à¤¾à¤‚ हमारे दैनिक आहार का à¤à¤• अहमॠहिसà¥à¤¸à¤¾ होती है, जो ना केवल हमारे à¤à¥‹à¤œà¤¨ को पूरà¥à¤£à¤¤à¤¾ देते हà¥à¤ इसके सà¥à¤µà¤¾à¤¦ को बà¥à¤¾à¤¤à¥€ है बलà¥à¤•ि हमारे शरीर के लिठआवशà¥à¤¯à¤• पोषक ततà¥à¤µà¥‹à¤‚ की à¤à¥€ पूरà¥à¤¤à¤¿ करती है। हरी सबà¥à¤œà¤¿à¤¯à¤¾à¤‚ विटामिन, खनिज à¤à¤µà¤‚ à¤à¤‚टीऑकà¥à¤¸à¥€à¤¡à¥‡à¤‚ट से à¤à¤°à¤ªà¥‚र होती हैं। सबà¥à¤œà¤¿à¤¯à¥‹à¤‚ में करेला à¤à¤• à¤à¤¸à¥€ सबà¥à¤œà¥€ है, जो सà¥à¤µà¤¾à¤¦ में तो कड़वी हैं, पर औषधीय गà¥à¤£à¥‹à¤‚ à¤à¤µà¤‚ पोषक ततà¥à¤µà¥‹à¤‚ से à¤à¤°à¤ªà¥‚र होती है। इन गà¥à¤£à¥‹à¤‚ से à¤à¤°à¤ªà¥‚र होने के कारण कड़वी होने पर à¤à¥€ इस सबà¥à¤œà¥€ का वà¥à¤¯à¤¾à¤ªà¤• तौर पर उपयोग किया जाता है। करेला का उतà¥à¤ªà¤¾à¤¦à¤¨ à¤à¤¾à¤°à¤¤ के लगà¤à¤— हर हिसà¥à¤¸à¥‡ में किया जाता है। हम इस आरà¥à¤Ÿà¤¿à¤•ल में करेले की खेती से जà¥à¥œà¥€ महतà¥à¤µà¤ªà¥‚रà¥à¤£ जानकारी आपसे साà¤à¤¾ करने जा रहे हैं, ताकि अगर आप इस सबà¥à¤œà¥€ को उगाना चाहते हैं, तो उपयà¥à¤•à¥à¤¤ तरीके à¤à¤µà¤‚ देखà¤à¤¾à¤² के दà¥à¤µà¤¾à¤°à¤¾ बेहतर उपज पà¥à¤°à¤¾à¤ªà¥à¤¤ कर सकते हैं। देश की जनसंखà¥à¤¯à¤¾ जिस रफ़à¥à¤¤à¤¾à¤° से बॠरही है, उसी रफ़à¥à¤¤à¤¾à¤° से सबà¥à¤œà¤¿à¤¯à¥‹à¤‚ की à¤à¥€ मांग बॠरही है, पर हमारे पास à¤à¥‚मि उतनी की उतनी ही है और रहेगी à¤à¥€à¥¤ तो जरà¥à¤°à¤¤ है कृषि को उनà¥à¤¨à¤¤ तरीकों से किया जाà¤, तà¤à¥€ हम बà¥à¤¤à¥€ खादà¥à¤¯ आपूरà¥à¤¤à¤¿ की मांग को पूरा करने के साथ-साथ अपनी आय में à¤à¥€ बà¥à¥‹à¤¤à¤°à¥€ कर
à¤à¤¾à¤°à¤¤ में करेले की खेती पà¥à¤°à¤®à¥à¤– रूप से खरीफ à¤à¤µà¤‚ रबी दोनों मौसम में की जाती है। गà¥à¤°à¥€à¤·à¥à¤® ऋतॠमें 15 फरवरी से 15 मारà¥à¤š तक की जाती है, वहीठवरà¥à¤·à¤¾ ऋतॠमें 15 जून से 15 जà¥à¤²à¤¾à¤ˆ तक इसकी बà¥à¤†à¤ˆ की जाती है। लेकिन वरà¥à¤·à¤à¤° मांग होने की वजह से इसकी समय से पहले या समय के बाद à¤à¥€ खेती की जाती है। यानी कहें तो à¤à¤¾à¤°à¤¤ में इसकी खेती वरà¥à¤· à¤à¤° की जाती है।
करेले की खेती के लिठगरà¥à¤® à¤à¤µà¤‚ आरà¥à¤¦à¥à¤° जलवायॠउपयà¥à¤•à¥à¤¤ मानी जाती है। करेले के बीज के सà¥à¤µà¤¸à¥à¤¥ अंकà¥à¤°à¤£ के लिठ30 से 35 डिगà¥à¤°à¥€ सेंटीगà¥à¤°à¥‡à¤¡ तापमान à¤à¤µà¤‚ पौधे के अनà¥à¤•ूल विकास के लिठ32 से 38 डिगà¥à¤°à¥€ का तापमान उपयà¥à¤•à¥à¤¤ माना जाता है।
करेले की खेती के लिठउपयà¥à¤•à¥à¤¤ मिटà¥à¤Ÿà¥€ कौन सी होती है?
बलà¥à¤ˆ दोमट à¤à¤µà¤‚ हà¥à¤¯à¥‚मस वाली चिकनी मिटà¥à¤Ÿà¥€ करेले के लिठउपयà¥à¤•à¥à¤¤ मानी जाती है, कà¥à¤¯à¥‹à¤‚कि इसकी जल धारण कà¥à¤·à¤®à¤¤à¤¾ अधिक होने के साथ पीà¤à¤š वैलà¥à¤¯à¥‚ 6 से 7 के बीच होता है। करेले की खेती के लिठवैसी à¤à¥‚मि का चà¥à¤¨à¤¾à¤µ करना चाहिà¤, जहाठजलनिकासी की उपयà¥à¤•à¥à¤¤ वà¥à¤¯à¤µà¤¸à¥à¤¥à¤¾ हो।
करेले की खेती के लिठमिटà¥à¤Ÿà¥€ की तैयारी करने के लिठकोई विशेष पà¥à¤°à¤•à¥à¤°à¤¿à¤¯à¤¾ नहीं अपनाई जाती है, बलà¥à¤•ि इसके लिठपारंपरिक हल या कलà¥à¤Ÿà¥€à¤µà¥‡à¤Ÿà¤° के दà¥à¤µà¤¾à¤°à¤¾ 3 से 4 बार अचà¥à¤›à¥€ तरह से जà¥à¤¤à¤¾à¤ˆ करनी होती है। उलà¥à¤²à¥‡à¤–नीय है कि पà¥à¤°à¤¤à¥à¤¯à¥‡à¤• जà¥à¤¤à¤¾à¤ˆ के बाद पाटा लगाकर मिटà¥à¤Ÿà¥€ को à¤à¥à¤°à¤à¥à¤°à¥€ à¤à¤µà¤‚ मिटà¥à¤Ÿà¥€ के तल को à¤à¤• समान कर लेना चाहिà¤, जिससे सिंचाई के दौरान पानी की समान मातà¥à¤°à¤¾ मिटà¥à¤Ÿà¥€ तक जा सके।
फसल के सही किसà¥à¤® का चà¥à¤¨à¤¾à¤µ करना बहà¥à¤¤ ही अहमॠकारà¥à¤¯ माना जाता है। कà¥à¤¯à¥‹à¤‚कि यह आपके उपज को पà¥à¤°à¤à¤¾à¤µà¤¿à¤¤ करता है। हो सकता है पूरà¥à¤µ में बीज के जिस किसà¥à¤® का आप उपयोग कर रहे थे, उससे अधिक उपज देने वाली उनà¥à¤¨à¤¤ किसà¥à¤® मारà¥à¤•ेट में उपलबà¥à¤§ हो। इसलिठआपको बीज के चà¥à¤¨à¤¾à¤µ करने में थोड़ा जागरूक à¤à¤µà¤‚ अपडेटेड रहने की जरà¥à¤°à¤¤ है। अगर कोई नई किसà¥à¤® विकसित की गयी हो, तो इसकी जानकारी आप अपने जिले के कृषि विजà¥à¤žà¤¾à¤¨ केंदà¥à¤° (KVK) से पà¥à¤°à¤¾à¤ªà¥à¤¤ कर सकते हैं। उलà¥à¤²à¥‡à¤–नीय है कि अà¤à¥€ हाल ही में आयोजित पूसा कृषि विजà¥à¤žà¤¾à¤¨ मेले में करेले की विकसित 3 संकर किसà¥à¤®à¥‹à¤‚ को विकसित किये जाने की जानकारी दी गयी है। नीचे करेले की कà¥à¤› पà¥à¤°à¤®à¥à¤– उनà¥à¤¨à¤¤ किसà¥à¤®à¥‹à¤‚ की जानकारी दी जा रही है, जिसे रोग-पà¥à¤°à¤¤à¤¿à¤°à¥‹à¤§à¥€ होने के साथ-साथ बेहतर उपज वाला माना जाता है।
यह किसà¥à¤® खरीफ à¤à¤µà¤‚ जायद दोनों मौसमों में बोई जा सकती है। इसकी बà¥à¤†à¤ˆ से लेकर तà¥à¥œà¤¾à¤ˆ तक का समय लगà¤à¤— 55 दिनों का होता है। इसके फल हरे, थोड़े मोटे होते हैं, जिसकी लमà¥à¤¬à¤¾à¤ˆ 18 सेमी तक होती है।
यह खरीफ मौसम में बोई जाने वाली पà¥à¤°à¤®à¥à¤– किसà¥à¤® है। इसके फल हरे, पतले à¤à¤µà¤‚ मधà¥à¤¯à¤® आकार के होते हैं, जिसका वजन 115 गà¥à¤°à¤¾à¤® तक होता है।
यह उनके लिठबहà¥à¤¤ ही उपयà¥à¤•à¥à¤¤ किसà¥à¤® है, जो करेले की कड़वाहट से परहेज करते हैं, कà¥à¤¯à¥‹à¤‚कि यह बहà¥à¤¤ ही कम कड़वी फल देता है। इसके साथ ही इस किसà¥à¤® के फल में बीज की à¤à¥€ बहà¥à¤¤ कम मातà¥à¤°à¤¾ होती है।
यह विशेषकर खरीफ मौसम में बोई जाने वाली किसà¥à¤® है, इसके फल हलà¥à¤•े हरे à¤à¤µà¤‚ काफी लंबाई वाले होते हैं। यह किसà¥à¤® लमà¥à¤¬à¥‡ समय तक उपज देने की कà¥à¤·à¤®à¤¤à¤¾ रखता है।
करेले की खेती के लिठनाइटà¥à¤°à¥‹à¤œ, फासà¥à¤«à¥‹à¤°à¤¸ à¤à¤µà¤‚ पोटाश उरà¥à¤µà¤°à¤• का पà¥à¤°à¤¯à¥‹à¤— किया जाता है। जहाठतक इसकी मातà¥à¤°à¤¾ कि बात है, तो आप à¤à¤• हेकà¥à¤Ÿà¥‡à¤¯à¤° में 50 किलोगà¥à¤°à¤¾à¤® नाइटà¥à¤°à¥‹à¤œà¤¨, 25 से 30 किलोगà¥à¤°à¤¾à¤® फासà¥à¤«à¥‹à¤°à¤¸, à¤à¤µà¤‚ 20 से 30 किलोगà¥à¤°à¤¾à¤® पोटाश का पà¥à¤°à¤¯à¥‹à¤— करें। धà¥à¤¯à¤¾à¤¨ रहे à¤à¤• ही बारी में सà¤à¥€ को नहीं डालनी है, बलà¥à¤•ि नाइटà¥à¤°à¥‹à¤œà¤¨ की à¤à¤• तिहाई मातà¥à¤°à¤¾, फासà¥à¤«à¥‹à¤°à¤¸ à¤à¤µà¤‚ पोटाश की पूरी मातà¥à¤°à¤¾ खेत यानी मिटà¥à¤Ÿà¥€ की तैयारी के समय डालनी चाहिà¤à¥¤ बचे हà¥à¤ नाइटà¥à¤°à¥‹à¤œ को बीज की बà¥à¤†à¤ˆ से 30 से 45 दिनों के बाद फसल के जड़ के पास डà¥à¤°à¥‡à¤¸à¤¿à¤‚ग करनी चाहिà¤à¥¤
जैसे बीज का चà¥à¤¨à¤¾à¤µ अहमॠहोता है, उसी तरह बीज की सहित मातà¥à¤°à¤¾ का निरà¥à¤§à¤¾à¤°à¤£ à¤à¥€ कृषि का à¤à¤• महतà¥à¤µà¤ªà¥‚रà¥à¤£ à¤à¤¾à¤— है। बीज की कम या अधिक मातà¥à¤°à¤¾, दोनों सà¥à¤¥à¤¿à¤¤à¤¿à¤¯à¥‹à¤‚ में आपके उपज पर पà¥à¤°à¤à¤¾à¤µ डाल सकता है। à¤à¤• हेकà¥à¤Ÿà¥‡à¤¯à¤° में करेले की सबà¥à¤œà¥€ उगाने के लिठ5 से 6 किलोगà¥à¤°à¤¾à¤® बीज की आवशà¥à¤¯à¤•ता होती है।
करेले की बीज की बà¥à¤†à¤ˆ मिटà¥à¤Ÿà¥€ के मेड़ों पर करना उपयà¥à¤•à¥à¤¤ होता है। कतार से कतार की दूरी 1।5 से 2।5 मीटर रखनी चाहिà¤, वहीठपौधे से पौधे की दूरी 45 से 60 सेमी रखनी चाहिà¤à¥¤
सिंचाई की मातà¥à¤°à¤¾ मिटà¥à¤Ÿà¥€ के पà¥à¤°à¤•ार à¤à¤µà¤‚ जलवायॠपर निरà¥à¤à¤° करती है। सामानà¥à¤¯à¤¤à¤ƒ खरीफ ऋतॠमें खेती की सिंचाई की आवशà¥à¤¯à¤•ता नहीं होती है। परनà¥à¤¤à¥ यदि वरà¥à¤·à¤¾ सामानà¥à¤¯ ना हà¥à¤¯à¥€ हो तो आवशà¥à¤¯à¤•तानà¥à¤¸à¤¾à¤° सिंचाई करनी चाहिà¤à¥¤ वहीठगरà¥à¤®à¥€ के मौसम में चूà¤à¤•ि तापमान अधिक रहती है, जिससे मिटà¥à¤Ÿà¥€ की नमी सूख जाती है। इसलिठइस मौसम में आपको 4 से 5 दिन के अनà¥à¤¤à¤°à¤¾à¤² में सिचाई करते रहने की जरà¥à¤°à¤¤ होती है।
वरà¥à¤·à¤¾ ऋतॠहो या गरà¥à¤®à¥€, अकà¥à¤¸à¤° सिंचाई के बाद खेतों में कई तरह के खरपतवार उग आते हैं, जिसे समय रहते निकाल देना आवशà¥à¤¯à¤• है। नहीं तो ये पौधे को मिलने वाली नमी को खà¥à¤¦ ले लेते हैं। पौधे के सà¥à¤µà¤¸à¥à¤¥ à¤à¤µà¤‚ बेहतर विकास के लिठपूरे फसल काल में कà¥à¤² 2 से 3 बार गà¥à¥œà¤¾à¤ˆ अवशà¥à¤¯ करनी चाहिà¤à¥¤
फसल की बà¥à¤†à¤ˆ से तà¥à¥œà¤¾à¤ˆ तक किसानों को फसल की सà¥à¤°à¤•à¥à¤·à¤¾ सà¥à¤¨à¤¿à¤¶à¥à¤šà¤¿à¤¤ करनी होती है। सà¥à¤µà¤¾à¤¦ में कड़वी इस सबà¥à¤œà¥€ को à¤à¥€ अपना आहार बनाने वाली बहà¥à¤¤ सी कीटें हैं, जिनसे समय रहते पौधे का बचाव करना आवशà¥à¤¯à¤• है। आइये जानते हैं, वे कौन-कौन सी कीटें हैं, जो करेले की फसल को नà¥à¤•सान पहà¥à¤à¤šà¤¾à¤¨à¥‡ का काम करते हैं।
यह चमकीला नारंगी रंग का कीट होता है, जिसके सिर, वकà¥à¤·, à¤à¤µà¤‚ उदर का निचला à¤à¤¾à¤— काला होता है। इसकी इलà¥à¤²à¥€ का निवास सà¥à¤¥à¤¾à¤¨ मिटà¥à¤Ÿà¥€ है, जो वयसà¥à¤• होने पर पौधे की पतà¥à¤¤à¤¿à¤¯à¥‹à¤‚ को नà¥à¤•सान पहà¥à¤‚चाती है। इनकी सकà¥à¤°à¤¿à¤¯à¤¤à¤¾ जनवरी से मारà¥à¤š महीने में अधिक रहती है। अगर अधिक मातà¥à¤°à¤¾ में ये फसल पर आकà¥à¤°à¤®à¤£ कर दें, तो पूरे फसल को पतà¥à¤¤à¥€à¤µà¤¿à¤¹à¥€à¤¨ कर सकते हैं।
इसके नियंतà¥à¤°à¤£ के लिठआपको सà¥à¤¬à¤¹ ओस पड़ने के वकà¥à¤¤ पौधे की पतà¥à¤¤à¤¿à¤¯à¥‹à¤‚ पर राख का छिडकाव करना चाहिà¤à¥¤ इससे यह पौधे की पतà¥à¤¤à¤¿à¤¯à¥‹à¤‚ पर नहीं बैठते हैं, जिससे पतà¥à¤¤à¤¿à¤¯à¤¾à¤‚ नà¥à¤•सान से बची रहती है। जैविक तरीके से à¤à¥€ इसपर नियंतà¥à¤°à¤£ पाया जा सकता है, इसके लिठआपको आजादीरेकà¥à¤Ÿà¤¿à¤¨ 300 पीपीà¤à¤® @5-10 मिली/लीटर या आजादीरेकà¥à¤Ÿà¤¿à¤¨ 5 पà¥à¤°à¤¤à¤¿à¤¶à¤¤ @0.5 मिली/लीटर की दर से 2 से 3 बार छिड़काव करनी चाहिà¤à¥¤ इस कीट का अगर अधिक पà¥à¤°à¤•ोप हो जाठतो आप तà¥à¤µà¤°à¤¿à¤¤ परिणाम के लिठकीटनाशक डाईकà¥à¤²à¥‹à¤°à¥‹à¤µà¤¾à¤¸ या टà¥à¤°à¤¾à¤ˆà¤•à¥à¤²à¥‹à¤«à¥‡à¤°à¤¾à¤¨ का à¤à¥€ छिडकाव कर सकते हैं।
इसकी पà¥à¤°à¥Œà¥ मकà¥à¤–ी गहरे à¤à¥‚रे रंग की होती है। इसके सिर पर काले à¤à¤µà¤‚ सफ़ेद धबà¥à¤¬à¥‡ पाठजाते हैं। यह मà¥à¤²à¤¾à¤¯à¤® फलों के छिलके के अनà¥à¤¦à¤° अंडा देना पसंद करती है, जिसके बाद अंडे से सूडी निकलकर फल के अनà¥à¤¦à¤° का à¤à¤¾à¤— खा जाती है।
इसके नियंतà¥à¤°à¤£ के लिठगरà¥à¤®à¥€ के मौसम में खेत की गहरी जà¥à¤¤à¤¾à¤ˆ करनी चाहिà¤à¥¤ या फिर पौधे के आसपास खà¥à¤¦à¤¾à¤ˆ करने पर मिटà¥à¤Ÿà¥€ के अनà¥à¤¦à¤° फलमकà¥à¤–ी के पà¥à¤¯à¥‚मा तक धूप का पà¥à¤°à¤µà¥‡à¤¶ होने पर यह नषà¥à¤Ÿ हो जाता है। इसके साथ ही तà¥à¤µà¤°à¤¿à¤¤ परिणाम पà¥à¤°à¤¾à¤ªà¥à¤¤ करने के लिठआप डाईकà¥à¤²à¥‹à¤°à¥‹à¤µà¤¾à¤¸ या कारà¥à¤¬à¤¾à¤°à¤¿à¤² या मैलाथियान के घोल का उपयोग कर सकते हैं।
यदि पौधे की पतà¥à¤¤à¤¿à¤¯à¥‹à¤‚ à¤à¤µà¤‚ तनों की सतह पर सफ़ेद या धà¥à¤‚धले धूसर दिखाई देने लगे तो समà¤à¤¿à¤¯à¥‡ यह चूरà¥à¤£à¤¿à¤² फफूंद रोग है। इस रोग से गà¥à¤°à¤¸à¤¿à¤¤ होने पर फलों का आकार छोटा हो जाता है।
इसके नियंतà¥à¤°à¤£ का सबसे आसान तरीका है, इस रोग से गà¥à¤°à¤¸à¤¿à¤¤ हà¥à¤ सà¤à¥€ पौधे को जड़ से उखाड़ कर इकठà¥à¤ ा का उसे जला दें। या फिर टà¥à¤°à¤¾à¤ˆà¤¡à¥€à¤«à¥‰à¤°à¥à¤® या माइकà¥à¤²à¥‹à¤¬à¥à¤²à¥‚टानिल जैसे फफूंदनाशक का पानी के साथ घोल बनाकर छिडकाव कर सकते हैं।
इस रोग का पà¥à¤°à¤•ोप वरà¥à¤·à¤¾ à¤à¤µà¤‚ गरà¥à¤®à¥€, दोनों समय बोई जाने वाली फसलों पर हो सकता है। इस रोग के लकà¥à¤·à¤£ में पतà¥à¤¤à¤¿à¤¯à¥‹à¤‚ के शिराओ में कोणीय धबà¥à¤¬à¥‡ का बनना है।
इस रोग से बचने के लिठबà¥à¤†à¤ˆ से पूरà¥à¤µ मेटलà¤à¤•à¥à¤¸à¤² कवकनाशी से बीज का उपचार करना चाहिà¤à¥¤ या मैंकोजेब का पानी के साथ घोल बनाकर छिडकाव करना चाहिà¤à¥¤
इस रोग रोग से पà¥à¤°à¤à¤¾à¤µà¤¿à¤¤ होने पर करेले के फल पर कवक की मातà¥à¤°à¤¾ में वृदà¥à¤§à¤¿ हो जाती है, जिससे फल सड़ने लगता है।
इसके लिठखेत में उचित जल-निकास की वà¥à¤¯à¤µà¤¸à¥à¤¥à¤¾ करनी चाहिà¤à¥¤ साथ ही यह धà¥à¤¯à¤¾à¤¨ रखना चाहिठकी फलों का सà¥à¤ªà¤°à¥à¤¶ à¤à¥‚मि से ना होने पाà¤à¥¤
इस रोग के गà¥à¤°à¤¸à¤¿à¤¤ होने पर पतà¥à¤¤à¤¿à¤¯à¤¾à¤‚ चितकबरा हो जाती है à¤à¤µà¤‚ सिकà¥à¥œ जाती है। इसके साथ ही पतà¥à¤¤à¤¿à¤¯à¤¾à¤‚ छोटी हो जाती है। इसके संकà¥à¤°à¤®à¤£ होने से पौधे का विकास रà¥à¤• जाता है।
इसके नियंतà¥à¤°à¤£ के लिठकोई पà¥à¤°à¤à¤¾à¤µà¥€ उपाय तो नहीं है, लेकिन इससे गà¥à¤°à¤¸à¤¿à¤¤ पौधे को नषà¥à¤Ÿ कर इस रोग पर नियंतà¥à¤°à¤£ पà¥à¤°à¤¾à¤ªà¥à¤¤ किया जा सकता है। या फिर इमिडाइकà¥à¤²à¥‹à¤°à¥‹à¤ªà¥à¤°à¤¿à¤¡ की उपयà¥à¤•à¥à¤¤ मातà¥à¤°à¤¾ का पानी के साथ घोल बनाकर 10 दिन के अंतराल में छिडकाव कर सकते हैं।
जब फलों का रंग गहरे हरे से हलà¥à¤•े हरे रंग का हो जाà¤, तो समà¤à¤¿à¤¯à¥‡ कि अब ये परिपकà¥à¤µ हो गया है और इसकी तà¥à¥œà¤¾à¤ˆ की जा सकती है। उलà¥à¤²à¥‡à¤–नीय है कि करेले की फल की तà¥à¥œà¤¾à¤ˆ à¤à¤• ही बार में नहीं बलà¥à¤•ि बारी बारी से करते रहनी चाहिà¤à¥¤ सामानà¥à¤¯à¤¤à¤ƒ बीज की बà¥à¤†à¤ˆ से 60 से 75 दिन के बाद फल तोड़ने योगà¥à¤¯ हो जाता है। फल के परिपकà¥à¤µ होने के शà¥à¤°à¥‚ होने के बाद तà¥à¥œà¤¾à¤ˆ का कारà¥à¤¯ हर 3 दिन के अनà¥à¤¤à¤°à¤¾à¤² पर करते रहना चाहिà¤à¥¤
हमनें इस आरà¥à¤Ÿà¤¿à¤•ल में करेले की खेती से जà¥à¥œà¥€ सà¤à¥€ आवशà¥à¤¯à¤• जानकारी को समेटने का पà¥à¤°à¤¯à¤¾à¤¸ किया है। अगर कोई किसान करेले की खेती करने के उतà¥à¤¸à¥à¤• है, तो आशा करते हैं उनà¥à¤¹à¥‡à¤‚ इस आरà¥à¤Ÿà¤¿à¤•ल में दी गयी जानकारी से लाठहà¥à¤† होगा। उलà¥à¤²à¥‡à¤–नीय है कि करेला à¤à¤• बहà¥à¤‰à¤ªà¤¯à¥‹à¤—ी सबà¥à¤œà¥€ है, जो सà¥à¤µà¤¾à¤¸à¥à¤¥à¥à¤¯ के साथ-साथ किसानों की आय को à¤à¥€ बढ़ाता है। वैजà¥à¤žà¤¾à¤¨à¤¿à¤• तरीके से खेती करने से न केवल उतà¥à¤ªà¤¾à¤¦à¤¨ में वृदà¥à¤§à¤¿ होती है, बलà¥à¤•ि बाजार में बेहतर कीमत à¤à¥€ मिलती है। विजà¥à¤žà¤¾à¤¨ à¤à¤µà¤‚ पà¥à¤°à¤¦à¥à¤¯à¥‹à¤—िकी का कृषि कà¥à¤·à¥‡à¤¤à¥à¤° में जितना अधिक उपयोग करेंगे, उतना ही अधिक बेहतर परिणाम पà¥à¤°à¤¾à¤ªà¥à¤¤ कर पाà¤à¤‚गे। देश को खादà¥à¤¯à¤¾à¤¨à¥à¤¨ की आपूरà¥à¤¤à¤¿ में आतà¥à¤®à¤¨à¤¿à¤°à¥à¤à¤° बनाने के लिठआज हर फसल की खेती में वैजà¥à¤žà¤¾à¤¨à¤¿à¤• तरीके अपनाये जाने की जरà¥à¤°à¤¤ है। इसी तरह की अनà¥à¤¯ जानकारी के साथ हम टॉप आरà¥à¤Ÿà¤¿à¤•ल सेकà¥à¤¶à¤¨ के अगले आरà¥à¤Ÿà¤¿à¤•ल में आपसे मà¥à¤²à¤¾à¤•ात की आशा करते हैं।