टमाटर à¤à¤• à¤à¤¸à¥€ पॉपà¥à¤²à¤° सबà¥à¤œà¥€ है जिसकी मांग वरà¥à¤· à¤à¤° बनी रहती है। à¤à¤• आम घरों के किचेन के वà¥à¤¯à¤‚जनों से लेकर 5 सà¥à¤Ÿà¤¾à¤° होटल के किचंस की रेसिपी की पूरà¥à¤£à¤¤à¤¾ बिना टमाटर के संà¤à¤µ नहीं है। इसका पà¥à¤°à¤¯à¥‹à¤— ताज़ी करने के अलावे इसको पà¥à¤°à¥‹à¤¸à¥‡à¤¸à¤¿à¤‚ग कर चटनी, जूस, अचार, कैचअप, सौस, à¤à¤µà¤‚ पà¥à¤¯à¥à¤°à¥€ आदि बनाठजाते हैं। इसकी लोकपà¥à¤°à¤¿à¤¯à¤¤à¤¾ का कारण सà¥à¤µà¤¾à¤¦ के साथ-साथ इसका पोषक ततà¥à¤µà¥‹à¤‚ से à¤à¤°à¤ªà¥‚र होना है। कà¥à¤¯à¥‹à¤‚कि यह ना केवल à¤à¥‹à¤œà¤¨ के सà¥à¤µà¤¾à¤¦ को बà¥à¤¾à¤¨à¥‡ वाली सबà¥à¤œà¥€ है, बलà¥à¤•ि मनà¥à¤·à¥à¤¯ के सà¥à¤µà¤¾à¤¸à¥à¤¥à¥à¤¯ के लिठजरà¥à¤°à¥€ कारà¥à¤¬à¥‹à¤¹à¤¾à¤‡à¤¡à¥à¤°à¥‡à¤Ÿ, विटामिन, कैलà¥à¤¸à¤¿à¤¯à¤®, लौह तथा अनà¥à¤¯ खनिज पदारà¥à¤¥à¥‹à¤‚ का बेहतरीन शà¥à¤°à¥‹à¤¤ है। टमाटर में लाइकोपीन नामक à¤à¤• पिगमेंट पाया जाता है, जिसे बेसà¥à¤Ÿ à¤à¤‚टीओकà¥à¤¸à¤¿à¤¡à¥‡à¤‚ट माना जाता है। इसके साथ ही इसमें कैरोटिनॉयडà¥à¤¸, विटामिन-सी जैसे à¤à¤‚टीओकà¥à¤¸à¤¿à¤¡à¥‡à¤‚ट पà¥à¤°à¤šà¥à¤° मातà¥à¤°à¤¾ में पाठजाते हैं। आज हम इस आरà¥à¤Ÿà¤¿à¤•ल में सà¥à¤µà¤¾à¤¦ à¤à¤µà¤‚ सà¥à¤µà¤¾à¤¸à¥à¤¥à¥à¤¯ को बà¥à¤¾à¤¨à¥‡ वाली सबà¥à¤œà¥€ टमाटर की वैजà¥à¤žà¤¾à¤¨à¤¿à¤• खेती करने के तरीके के बारे में जानेंगें।
उलà¥à¤²à¥‡à¤–नीय है कि à¤à¤¾à¤°à¤¤ के लगà¤à¤— हर कà¥à¤·à¥‡à¤¤à¥à¤°à¥‹à¤‚ में टमाटर की खेती की जाती है, जिनमें टमाटर के सबसे अधिक उतà¥à¤ªà¤¾à¤¦à¤• राजà¥à¤¯à¥‹à¤‚ में à¤
वैसे अनà¥à¤•ूल तापकà¥à¤°à¤® का सà¤à¥€ फसलों के लिठमहतà¥à¤µ होता है, लेकिन टमाटर के मामले में इसका महतà¥à¤¤à¥à¤µ कà¥à¤› अधिक होता है, कà¥à¤¯à¥‹à¤‚कि इसके लिठआवशà¥à¤¯à¤• तापमान से अधिक होना इसके फलों को नà¥à¤•सान पहà¥à¤‚चाती है, जिसमें फलों का छोटा होना, अविकसित होना या गिरना शामिल है। इसलिठटमाटर के सà¥à¤µà¤¸à¥à¤¥ विकास के लिठइसको 20-25 डिगà¥à¤°à¥€ सेंटीगà¥à¤°à¥‡à¤¡ के बीच तापकà¥à¤°à¤® वाली जलवायॠउपयà¥à¤•à¥à¤¤ है।
टमाटर की खेती के लिठहà¥à¤¯à¥‚मस वाली (जिसमें जीवांश हो) रेतीली दोमट मिटà¥à¤Ÿà¥€ उपयà¥à¤•à¥à¤¤ होती है। कहीं-कहीं की मिटà¥à¤Ÿà¥€ अधिक अमà¥à¤²à¥€à¤¯ होती है, à¤à¤¸à¥‡ में चूने के पà¥à¤°à¤¯à¥‹à¤— से मिटà¥à¤Ÿà¥€ की अमà¥à¤²à¥€à¤¯à¤¤à¤¾ को घटानी चाहिà¤à¥¤ जà¥à¤¤à¤¾à¤ˆ में कोई विशेष पà¥à¤°à¤•à¥à¤°à¤¿à¤¯à¤¾ नहीं अपनानी होती है, बस आपको 3-4 बार जà¥à¤¤à¤¾à¤ˆ करने के बाद पाटा लगाने की आवशà¥à¤¯à¤•ता पड़ती है, ताकि मिटà¥à¤Ÿà¥€ à¤à¥à¤°à¤à¤°à¥€ होने के साथ मिटà¥à¤Ÿà¥€ समतल हो जाà¤à¥¤
किसी à¤à¥€ फसल की बेहतर पैदावार के लिठउनà¥à¤¨à¤¤ बीज का चà¥à¤¨à¤¾à¤µ à¤à¥€ à¤à¤• अहमॠकदम होता है। देश à¤à¤° में 16 हजार से à¤à¥€ अधिक कृषि वैजà¥à¤žà¤¾à¤¨à¤¿à¤• कृषि के विकास के लिठसमरà¥à¤ªà¤¿à¤¤ है, à¤à¤¸à¥‡ में वे कृषि की बेहतरी के लिठनà¤-नठउनà¥à¤¨à¤¤ किसà¥à¤®à¥‹à¤‚ का विकास करते रहे हैं। à¤à¤¾à¤°à¤¤ à¤à¤° में टमाटर की निमà¥à¤¨ पà¥à¤°à¤®à¥à¤– किसà¥à¤®à¥‡à¤‚ हैं, जो पैदावार के हिसाब से बेहतर होने के साथ-साथ रोग पà¥à¤°à¤¤à¤¿à¤°à¥‹à¤§à¥€ à¤à¥€ हैं।
बीजों के चà¥à¤¨à¤¾à¤µ में किसानों को कृषि वैजà¥à¤žà¤¾à¤¨à¤¿à¤•ों की à¤à¥€ सलाह लेने की जरà¥à¤°à¤¤ है, अगर कोई नई किसà¥à¤® आने वाली हो या उपलबà¥à¤§ हो तो किसान सलाहनà¥à¤¸à¤¾à¤° उसकी बà¥à¤†à¤ˆ कर सकते हैं। देश में पà¥à¤°à¤¤à¥à¤¯à¥‡à¤• जिले में कृषि के लिठसमरà¥à¤ªà¤¿à¤¤ कृषि विजà¥à¤žà¤¾à¤¨ केंदà¥à¤° होते हैं, जहाठसे किसान उनà¥à¤¨à¤¤ बीज की जानकारी पà¥à¤°à¤¾à¤ªà¥à¤¤ कर सकते हैं।
किसी à¤à¥€ खेती में बेसà¥à¤Ÿ यह होता है कि खाद à¤à¤µà¤‚ उरà¥à¤µà¤°à¤• के पà¥à¤°à¤¯à¥‹à¤— से पहले मिटà¥à¤Ÿà¥€ की जाà¤à¤š अवशà¥à¤¯ करवा लें, कà¥à¤¯à¥‹à¤‚कि तà¤à¥€ आप मिटà¥à¤Ÿà¥€ में पोषक ततà¥à¤µà¥‹à¤‚ की कमी के आधार पर उपयà¥à¤•à¥à¤¤ उरà¥à¤µà¤°à¤• का पà¥à¤°à¤¯à¥‹à¤— कर पाà¤à¤‚गे। खाद à¤à¤µà¤‚ उरà¥à¤µà¤°à¤• का पà¥à¤°à¤¯à¥‹à¤— का पैमाना किसी à¤à¥€ मिटà¥à¤Ÿà¥€ की उरà¥à¤µà¤°à¤¤à¤¾ शकà¥à¤¤à¤¿ होती है। अगर सामानà¥à¤¯ तौर की बात करें तो 20 से 25 टन सड़ी हà¥à¤¯à¥€ गोबर या कमà¥à¤ªà¥‹à¤¸à¥à¤Ÿ खाद à¤à¤µà¤‚ 100 से 150 किलोगà¥à¤°à¤¾à¤® नाइटà¥à¤°à¥‹à¤œà¤¨, 60 से 80 किलोगà¥à¤°à¤¾à¤® फासà¥à¤«à¥‹à¤°à¤¸ तथा 60 से 80 किलोगà¥à¤°à¤¾à¤® पोटाश डालनी चाहिà¤à¥¤ कà¥à¤› किसà¥à¤®à¥‡à¤‚ असीमित वृदà¥à¤§à¤¿ वाली होती है, जिसके लिठनाइटà¥à¤°à¥‹à¤œà¤¨ की मातà¥à¤°à¤¾ बà¥à¤¾à¤•र 200 किलोगà¥à¤°à¤¾à¤® पà¥à¤°à¤¤à¤¿ हेकà¥à¤Ÿà¥‡à¤¯à¤° करनी चाहिà¤à¥¤ वही फासà¥à¤«à¥‹à¤°à¤¸ à¤à¤µà¤‚ पोटाश की कà¥à¤² मातà¥à¤°à¤¾ यानी 60-80 किलोगà¥à¤°à¤¾à¤® पà¥à¤°à¤¯à¥‹à¤— करनी चाहिठà¤à¤µà¤‚ इसमें नाइटà¥à¤°à¥‹à¤œà¤¨ की à¤à¤•-तिहाई मातà¥à¤°à¤¾ बीज की बà¥à¤†à¤ˆ से पूरà¥à¤µ ही खेत में डाल देनी चाहिà¤à¥¤ बाकी नाइटà¥à¤°à¥‹à¤œà¤¨ को 2 बराबर मातà¥à¤°à¤¾ में बाà¤à¤Ÿà¤•र 25-30 à¤à¤µà¤‚ 45-50 दिनों के बाद खड़ी फसल में डालनी चाहिà¤à¥¤
आपको बता दें कि खेतों में टमाटर के बीज की सीधे बà¥à¤†à¤ˆ नहीं की जाती है, बलà¥à¤•ि पहले इसके पौधे की तैयारी के लिठà¤à¤• पौधशाला का निरà¥à¤®à¤¾à¤£ किया जाता है, जहाठअनà¥à¤•ूलित सà¥à¤¥à¤¤à¤¿ में 3 से चार पतà¥à¤¤à¥€ तक पौधे को निकलने दिया जाता है, जिसके बाद इसकी खेतों में रोपाई की जाती है। पौधशाला में टमाटर की सà¤à¥€ पà¥à¤°à¤•ार की बीजों की बà¥à¤†à¤ˆ का à¤à¤• समय नहीं होता है, बलà¥à¤•ि बीज के किसà¥à¤®à¥‹à¤‚ à¤à¤µà¤‚ सà¥à¤¥à¤¾à¤¨ के अनà¥à¤¸à¤¾à¤° अलग-अलग होती है। शरदकालीन के लिठजà¥à¤²à¤¾à¤ˆ से सितंबर का माह, वसंत à¤à¤µà¤‚ गà¥à¤°à¥€à¤·à¥à¤® ऋतॠके लिठनवमà¥à¤¬à¤°-दिसमà¥à¤¬à¤° का महिना à¤à¤µà¤‚ पहाड़ी वाले इलाकों में इसकी बà¥à¤†à¤ˆ का उपयà¥à¤•à¥à¤¤ समय मारà¥à¤š से अपà¥à¤°à¥ˆà¤² का माह होता है। इस पà¥à¤°à¤•ार पूरे वरà¥à¤· à¤à¤° टमाटर की खेती की जा सकती है।
अब टमाटर की खेती में à¤à¤• अहमॠसवाल होता है कि आखिर बीज की बà¥à¤†à¤ˆ की मातà¥à¤°à¤¾ का पैमाना कà¥à¤¯à¤¾ होनी चाहिà¤, तो बता दें आपको बीज की मातà¥à¤°à¤¾ टमाटर के बीजों की किसà¥à¤®à¥‹à¤‚ के आधार पर तय करनी चाहिà¤à¥¤ सामानà¥à¤¯à¤¤à¤¯à¤¾ उनà¥à¤¨à¤¤ किसà¥à¤®à¥‹à¤‚ जो मà¥à¤•à¥à¤¤ परागित किसà¥à¤®à¥‡à¤‚ होती हैं, उनकी पà¥à¤°à¤¤à¤¿ हेकà¥à¤Ÿà¥‡à¤¯à¤° 350 से 400 गà¥à¤°à¤¾à¤® की मातà¥à¤°à¤¾ लेनी चाहिà¤à¥¤ वहीं वहीठसंकर किसà¥à¤®à¥‹à¤‚ की 200-250 गà¥à¤°à¤¾à¤® पà¥à¤°à¤¤à¤¿ हेकà¥à¤Ÿà¥‡à¤¯à¤° बीज लेनी चाहिà¤à¥¤
पौधशाला यानी नरà¥à¤¸à¤°à¥€ में जब 15 से 20 सेमी लमà¥à¤¬à¤¾à¤ˆ à¤à¤µà¤‚ 5 से 6 पतà¥à¤¤à¤¿à¤¯à¥‹à¤‚ वाला पौध तैयार हो जाà¤, तो समà¤à¤¿à¤¯à¥‡ अब यह खेतों में बà¥à¤†à¤ˆ के लिठपरिपकà¥à¤µ हो चà¥à¤•ा है। आप पौधे से पौधे की दूरी किसà¥à¤®, à¤à¥‚मि की उरà¥à¤µà¤°à¤¤à¤¾ à¤à¤µà¤‚ रोपाई के समय के आधार पर तय कर सकते हैं। धà¥à¤¯à¤¾à¤¨ रखे की खेतों में पौध की रोपाई करने से 3 से 4 दिन पहले से ही पौधशाला में सिंचाई बंद कर देनी चाहिà¤à¥¤
नीचे पौधशाला में बीज की बà¥à¤†à¤ˆ, खेतों में रोपाई की समय, à¤à¤µà¤‚ पौधे से पौधे की दूरी की सारणी दी गयी है:
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कà¥à¤·à¥‡à¤¤à¥à¤° |
बीज की बà¥à¤†à¤ˆ का समय |
खेतों में रोपाई का समय |
दूरी (सेमी) |
दूरी (सेमी) |
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मैदानी कà¥à¤·à¥‡à¤¤à¥à¤° (शरद ऋतà¥) |
जà¥à¤²à¤¾à¤ˆ से सितंबर |
अगसà¥à¤¤ से अकà¥à¤Ÿà¥‚बर |
60 x 60 |
90 x 50 |
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वसंत/गà¥à¤°à¥€à¤·à¥à¤® ऋतॠ|
नवमà¥à¤¬à¤° से दिसंबर |
दिसमà¥à¤¬à¤° से जनवरी |
60 x 45 |
90 x 50 |
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पहाड़ी कà¥à¤·à¥‡à¤¤à¥à¤° |
मारà¥à¤š से अपà¥à¤°à¥ˆà¤² |
अपà¥à¤°à¥ˆà¤² से मई |
60 x 45 |
90 x 50 |
किसी à¤à¥€ फसल की उचà¥à¤š उतà¥à¤ªà¤¾à¤¦à¤•ता के लिठउचित मातà¥à¤°à¤¾ में सिंचाई होनी बहà¥à¤¤ ही आवशà¥à¤¯à¤• है। टमाटर के मामले में पौधे की खेतों में रोपाई के 2 से 3 दिनों बाद फवà¥à¤µà¤¾à¤°à¥‡ से पानी देनी चाहिà¤à¥¤ गरà¥à¤®à¥€ के मौसम के दौरान 6 से 8 दिनों के अनà¥à¤¤à¤°à¤¾à¤² में à¤à¤µà¤‚ सरà¥à¤¦à¤¿à¤¯à¥‹à¤‚ में 10 से 15 दिनों के अनà¥à¤¤à¤°à¤¾à¤² में सिंचाई करते रहनी चाहिà¤à¥¤ आपको सिंचाई के दौरान इस बात का आवशà¥à¤¯ धà¥à¤¯à¤¾à¤¨ रखना चाहिठकी सिंचाई के बाद खेतों में पानी जमनें ना पाà¤, कà¥à¤¯à¥‹à¤‚कि पानी के जमाव से पौधे मà¥à¤°à¤à¤¾à¤¨à¥‡ लगते हैं à¤à¤µà¤‚ रोग लगने की समà¥à¤à¤¾à¤µà¤¨à¤¾ à¤à¥€ बॠजाती है। इस पà¥à¤°à¤•ार सिंचाई के साथ-साथ जलनिकासी की à¤à¥€ उचित वà¥à¤¯à¤µà¤¸à¥à¤¥à¤¾ सà¥à¤¨à¤¿à¤¶à¥à¤šà¤¿à¤¤ करनी आवशà¥à¤¯à¤• है।
टमाटर की खेती के दौरान सà¥à¤µà¤¸à¥à¤¥ फसल के लिठखरपतवार का नियंतà¥à¤°à¤£ à¤à¤• बेहद ही जरà¥à¤°à¥€ कारà¥à¤¯ हो जाता है। किसान खरपतवार के नियंतà¥à¤°à¤£ के लिठखà¥à¤°à¤ªà¥€ या कà¥à¤¦à¤¾à¤² का सहारा ले सकते हैं, जिसकी मदद से गà¥à¤¡à¤¾à¤ˆ कर आप उनà¥à¤¨à¤¤ à¤à¤µà¤‚ बेहतर पैदावार सà¥à¤¨à¤¿à¤¶à¥à¤šà¤¿à¤¤ कर सकते हैं। इसके साथ ही इसके नियंतà¥à¤°à¤£ का दूसरा उपाय है पौध के नीचे पà¥à¤†à¤² या सूखे घास-फूंस बिछा सकते हैं, जिससे खरपतवार नहीं पनप पाता है।
टमाटर की बेहतर पैदावार के लिठनिकाई-गà¥à¥œà¤¾à¤ˆ करनी à¤à¥€ बहà¥à¤¤ आवशà¥à¤¯à¤• है। इसमें आपको खà¥à¤°à¤ªà¥€ आदि छोटे टूलà¥à¤¸ से पौध की जड़ों के पास मिटà¥à¤Ÿà¥€ चà¥à¤¾ देनी होती है, इससे पौध को सहारा तो मिलता ही है, साथ ही मिटà¥à¤Ÿà¥€ से पोषक ततà¥à¤µ à¤à¥€ सà¥à¤—मता से उपलबà¥à¤§ होते हैं
टमाटर की तà¥à¥œà¤¾à¤ˆ उसके उपयोग के अनà¥à¤¸à¤¾à¤° की जाती है। अगर आपको टमाटर नजदीकी बाजार में बेचना है तो आपको फल पकने के बाद तà¥à¥œà¤¾à¤ˆ करनी चाहिà¤, वहीठअगर टमाटर किसी दूर सà¥à¤¥à¤¿à¤¤ बाजार में à¤à¥‡à¤œà¤¨à¤¾ हो तो जैसे ही उसके रंग में बदलाव शà¥à¤°à¥‚ हो तो तà¥à¥œà¤¾à¤ˆ कर लेनी चाहिà¤à¥¤ à¤à¤¸à¤¾ इसलिठकà¥à¤¯à¥‹à¤‚किं टमाटर को पकने पर तोड़ने के बाद लमà¥à¤¬à¥‡ समय नहीं रखा जा सकता है, जिसके कारण दूर के बाजार में पूरी पकी हà¥à¤ˆ टमाटर ले जाने तक में ख़राब हो सकता है।
किसी à¤à¥€ फसल के लिठबीज बà¥à¤†à¤ˆ से लेकर कटाई या फल तà¥à¥œà¤¾à¤ˆ तक आपको उनकी देखà¤à¤¾à¤² करनी बहà¥à¤¤ ही जरà¥à¤°à¥€ है। à¤à¤¸à¥‡ बहà¥à¤¤ से कीटें हैं, जो टमाटर की फसल को बहà¥à¤¤ ही नà¥à¤•सान पहà¥à¤šà¤¾à¤¤à¥‡ हैं, इसलिठबेहतर उतà¥à¤ªà¤¾à¤¦à¤• के लिठउनका समय पर नियंतà¥à¤°à¤£ करना बेहद ही जरà¥à¤°à¥€ कारà¥à¤¯ है।
टमाटर को नà¥à¤•सान पहà¥à¤à¤šà¤¾à¤¨à¥‡ वाली पà¥à¤°à¤®à¥à¤– कीटें:
आइये जानते हैं इन कीटों से टमाटर की फसल को होने वाले नà¥à¤•सान à¤à¤µà¤‚ उनके नियंतà¥à¤°à¤£ के उपाय कà¥à¤¯à¤¾ हैं।
टमाटर का फल बेधक सà¥à¤‚डी- यह कीट टमाटर के कचà¥à¤šà¥‡ फलों को अपना आहार बनाती है, जो फलों में छेद करके इसके गà¥à¤¦à¥‡ को खाती है। इसके दà¥à¤µà¤¾à¤°à¤¾ फलों में छेद करने से फलों में फफूंद à¤à¥€ लग जाते हैं, जिससे फल सड़ जाते हैं।
इसके नियंतà¥à¤°à¤£ के लिठà¤à¤• तरीका जो अपनाया जाता है वो है, टमाटर के 16 पंकà¥à¤¤à¤¿à¤¯à¥‹à¤‚ के बाद à¤à¤• पंकà¥à¤¤à¤¿ गेंदा फूल की लगा दी जाती है, जिससे काफी हद तक इसका बचाव कीटों से हो जाता है। दूसरे उपाय में HNPV @ 250 LE को गà¥à¥œ के साथ (10 गà¥à¤°à¤¾à¤®/लीटर), साबà¥à¤¨ पाउडर (5 गà¥à¤°à¤¾à¤®/लीटर) à¤à¤µà¤‚ टिनोपाल (1 गà¥à¤°à¤¾à¤®/लीटर) को पानी में मिलाकर शाम के समय छिडकाव करने से फसल पर कीट आकà¥à¤°à¤®à¤£ नहीं करते हैं। इसके साथ ही मारà¥à¤•ेट में रेनेकà¥à¤¸à¥à¤ªà¤¾à¤¯à¤°, साइजेपर जैसे कीटनाशक मिल जायेंगें, जिसकी उपयà¥à¤•à¥à¤¤ मातà¥à¤°à¤¾ का छिडकाव कर आप इस कीट से अपनी फसल का बचाव कर सकते हैं।
सफ़ेद मकà¥à¤–ी (बैमीसिया टेबैकी)- यह छोटे à¤à¤µà¤‚ सफ़ेद आकर का कीट होता है, जिसका पूरा शरीर मोम से ढका होता है। ये पौधे के पतà¥à¤¤à¤¿à¤¯à¥‹à¤‚ से रस चूसते हैं à¤à¤µà¤‚ विषाणॠरोग का संचार करते हैं, जिससे पतà¥à¤¤à¤¿à¤¯à¤¾à¤‚ मà¥à¥œà¤¨à¥‡ लगती है और फूल à¤à¤µà¤‚ फल आने रà¥à¤• जाते हैं।
इसके नियंतà¥à¤°à¤£ के लिठबीज को इमिडाकà¥à¤²à¥‹à¤ªà¥à¤°à¤¿à¤¡ से उपचारित करना चाहिà¤à¥¤ इसके साथ ही आप मारà¥à¤•ेट में उपलबà¥à¤§ साइजेपर à¤à¤µà¤‚ थायामेथेकà¥à¤œà¤¾à¤® जैसे कीटनाशकों का à¤à¥€ सफ़ेद मकà¥à¤–ी के बचाव के लिठपà¥à¤°à¤¯à¥‹à¤— कर सकते हैं।
अनà¥à¤¯ फसलों की तरह टमाटर के पौधों को à¤à¥€ बहà¥à¤¤ सारे रोगों से बचाठरखना पड़ता है। टमाटर में लगने वाले रोग निमà¥à¤¨ हैं:
गà¥à¤°à¤šà¤¾ (परà¥à¤£à¤•à¥à¤‚चन विषाणà¥)-इस रोग से गà¥à¤°à¤¸à¤¿à¤¤ होने के बाद पतà¥à¤¤à¤¿à¤¯à¤¾à¤‚ नीचे की ओर या ऊपर की ओर मà¥à¥œ जाती है, यानी पतà¥à¤¤à¤¿à¤¯à¥‹à¤‚ में à¤à¤‚ठआ जाती है। रोग के अधिक विसà¥à¤¤à¤¾à¤° होने पर इन पौधों में फूल या फल लगने बंद हो जाते हैं।
यह रोग सफ़ेद मकà¥à¤–ियों दà¥à¤µà¤¾à¤°à¤¾ फैलाया जाता है, जिसके पà¥à¤°à¤à¤¾à¤µà¥€ पà¥à¤°à¤¬à¤¨à¥à¤§à¤¨ के लिठनरà¥à¤¸à¤°à¥€ में पौधे à¤à¤—à¥à¤°à¥‹à¤¨à¥‡à¤Ÿ जाली में उगाया जनन चाहिà¤à¥¤ इसके रोकथाम का दूसरा उपाय है कि रोपाई के समय पौधे की जड़ में 5 गà¥à¤°à¤¾à¤® पà¥à¤°à¤¤à¤¿ लीटर गà¥à¤¨à¤—à¥à¤¨à¥‡ पानी में घोल बनाकर पानी ठंढा हो जाने पर 2 से 3 घनà¥à¤Ÿà¥‹à¤‚ तक शोधन करना चाहिà¤à¥¤ इसके अलावे आप फूल आने तक इमिडाकà¥à¤²à¥‹à¤ªà¥à¤°à¤¿à¤¡ कीटनाशक का पà¥à¤°à¤¯à¥‹à¤— कर इस रोग से बचाव सà¥à¤¨à¤¿à¤¶à¥à¤šà¤¿à¤¤ कर सकते हैं।
अगेती à¤à¥à¤²à¤¸à¤¾)- इस रोग के संकà¥à¤°à¤®à¤£ से पौधे पर काले या गहरे à¤à¥‚रे रंग के धबà¥à¤¬à¥‡ बनने लगते हैं। रोग से पौधे में संकà¥à¤°à¤®à¤£ बà¥à¤¨à¥‡ से पौधे सà¥à¤–कर मरने लगते हैं।
इसके रोकथाम के लिठसà¥à¤µà¤¸à¥à¤¥ à¤à¤µà¤‚ रोग-पà¥à¤°à¤¤à¤¿à¤°à¥‹à¤§à¥€ बीजों का पà¥à¤°à¤¯à¥‹à¤— करना चाहिà¤à¥¤ इसलिठजरà¥à¤°à¥€ है कि बà¥à¤†à¤ˆ के पहले सà¥à¤µà¤¸à¥à¤¥ बीजों का चयन करें। फसल चकà¥à¤° में आपको à¤à¤¸à¥‡ खेतों में सोलेनेसी कà¥à¤² के पौधों का उपयोग करना चाहिà¤à¥¤ इसके दूसरे उपाय के तौर पर मारà¥à¤•ेट में मैंकोजेब जैसे फफूंदनाशक हैं, जिनका उचित मातà¥à¤°à¤¾ में पà¥à¤°à¤¯à¥‹à¤— कर आप इनसे टमाटर के पौधों का बचाव कर सकते हैं।
à¤à¤¾à¤°à¤¤ à¤à¤• कृषि पà¥à¤°à¤§à¤¾à¤¨ देश है, जहाठकृषि यानी अनà¥à¤¨, फल, à¤à¤µà¤‚ सबà¥à¤œà¤¿à¤¯à¥‹à¤‚ से होने वाली आय की जीडीपी में हिसà¥à¤¸à¥‡à¤¦à¤¾à¤°à¥€ लगà¤à¤— 16% है। à¤à¤¸à¥‡ में कृषि का विकास अहमॠहो जाता है। हमारी कृषि खादà¥à¤¯ आपूरà¥à¤¤à¤¿ के कà¥à¤·à¥‡à¤¤à¥à¤° में तà¤à¥€ बेहतर à¤à¥‚मिका निà¤à¤¾ पाà¤à¤—ी जब कृषि को वैजà¥à¤žà¤¾à¤¨à¤¿à¤• तरीके से किया जाà¤à¤—ा। बहà¥à¤¤ से किसान जानकारी के अà¤à¤¾à¤µ में अपने खेतों से बेहतर उतà¥à¤ªà¤¾à¤¦à¤¨ पà¥à¤°à¤¾à¤ªà¥à¤¤ नहीं कर पाते हैं। हमारे इस आरà¥à¤Ÿà¤¿à¤•ल का उदेशà¥à¤¯ किसानों की बेहतरी के लिठआवशà¥à¤¯à¤• सà¤à¥€ जानकारी तक उनकी पहà¥à¤à¤š सà¥à¤¨à¤¿à¤¶à¥à¤šà¤¿à¤¤ करनी है। आप कृषि या उससे जà¥à¥œà¥€ अनà¥à¤¯ टॉपिकà¥à¤¸ पर जानकारी के लिठहमारे वेबसाइट को à¤à¤•à¥à¤¸à¥à¤ªà¥à¤²à¥‹à¤° कर सकते हैं।