गà¥à¤²à¤¾à¤¬ (रोजा हाइबà¥à¤°à¤¿à¤¡à¤¾) रोजेसी कà¥à¤² का सदसà¥à¤¯ है। पà¥à¤°à¤¾à¤šà¥€à¤¨ काल में à¤à¥€ इसकी महतà¥à¤¤à¤¾ के हमें पà¥à¤°à¤®à¤¾à¤£ मिलते हैं। पà¥à¤°à¤¾à¤šà¥€à¤¨ काल के कई à¤à¤¸à¥‡ आà¤à¥‚षणों के अवशेष मिलते हैं, जिनपर गà¥à¤²à¤¾à¤¬ के फूल की चितà¥à¤°à¤•ारी की गयी है। आà¤à¥‚षणों पर गà¥à¤²à¤¾à¤¬ के फूलों के साथ-साथ इसके पतà¥à¤¤à¤¿à¤¯à¥‹à¤‚ की à¤à¥€ चितà¥à¤°à¤•ारी की हà¥à¤¯à¥€ मिलती है। बाइबिल और पà¥à¤°à¤¾à¤šà¥€à¤¨ संसà¥à¤•ृत गà¥à¤°à¤‚थों में à¤à¥€ गà¥à¤²à¤¾à¤¬ का जिकà¥à¤° मिलता है। आयà¥à¤°à¥à¤µà¥‡à¤¦à¤¾ में à¤à¥€ गà¥à¤²à¤¾à¤¬ के औषधीय गà¥à¤£à¥‹à¤‚ की चरà¥à¤šà¤¾ मिलती है। इस पà¥à¤°à¤•ार गà¥à¤²à¤¾à¤¬ का पà¥à¤°à¤¾à¤šà¥€à¤¨ काल से आज तक बहà¥à¤¤ ही महतà¥à¤¤à¥à¤µ रहा है।
गà¥à¤²à¤¾à¤¬ की उतà¥à¤ªà¤¤à¥à¤¤à¤¿ लगà¤à¤— 5,000 वरà¥à¤· पूरà¥à¤µ मानी जाती है। मà¥à¤–à¥à¤¯ रूप से चीन, मधà¥à¤¯ à¤à¤¶à¤¿à¤¯à¤¾ à¤à¤µà¤‚ à¤à¤¾à¤°à¤¤ को इसकी उतà¥à¤ªà¤¤à¥à¤¤à¤¿ सà¥à¤¥à¤² माना जाता है। विशà¥à¤µ à¤à¤° में गà¥à¤²à¤¾à¤¬ की हजारों किसà¥à¤®à¥‡à¤‚ उपलबà¥à¤§ हैं और यह लगà¤à¤— हर देश में उगाया जाता है।
गà¥à¤²à¤¾à¤¬ का उपयोग फूलों की सजावट, इतà¥à¤°, गà¥à¤²à¤•ंद, गà¥à¤²à¤¾à¤¬ जल, कॉसà¥à¤®à¥‡à¤Ÿà¤¿à¤• पà¥à¤°à¥‹à¤¡à¤•à¥à¤Ÿà¥à¤¸, पूजा-पाठà¤à¤µà¤‚ औषधीय कारà¥à¤¯à¥‹à¤‚ में किया जाता है। इसकी मांग वरà¥à¤· à¤à¤° बनी रहती है, खासकर वेलेंटाइन डे, शादी-विवाह à¤à¤µà¤‚ तà¥à¤¯à¥‹à¤¹à¤¾à¤°à¥‹à¤‚ में इसकी मांग à¤à¤µà¤‚ कीमतें दोनों बढ़ जाती हैं।
à¤à¤¾à¤°à¤¤ में विकसित की गयी à¤à¤µà¤‚ यहाठकी जलवायॠके अनà¥à¤•ूल गà¥à¤²à¤¾à¤¬ की पà¥à¤°à¤®à¥à¤– किसà¥à¤®à¥‹à¤‚ में पूसा सोनिया पà¥à¤°à¤¿à¤¯à¤¦à¤°à¥à¤¶à¤¿à¤¨à¥€, पà¥à¤°à¥‡à¤®à¤¾, मोहनी, बंजारन, डेलही पà¥à¤°à¤¿à¤‚सेज à¤à¤µà¤‚ अनà¥à¤¯ नाम शामिल हैं। वहीठनूरजहाठऔर डमसà¥à¤• रोज à¤à¤¸à¥€ दो किसà¥à¤®à¥‡à¤‚ हैं, जिनकी मांग विशेषकर सà¥à¤—नà¥à¤§à¤¿à¤¤ तेल के निरà¥à¤®à¤¾à¤£ के लिठकी जाती है।
गà¥à¤²à¤¾à¤¬ की खेती के लिठà¤à¤¾à¤°à¤¤ की जलवायॠउपयà¥à¤•à¥à¤¤ मानी जाती है। गà¥à¤²à¤¾à¤¬ बहà¥à¤µà¤°à¥à¤·à¥€à¤¯ वरà¥à¤— का पौधा है, जिसकी खेती à¤à¤¾à¤°à¤¤ के लगà¤à¤— सà¤à¥€ राजà¥à¤¯à¥‹à¤‚ में की जाती है। गà¥à¤²à¤¾à¤¬ की सबसे अधिक पà¥à¤°à¥‹à¤¡à¤•à¥à¤¶à¤¨ करने वाले à¤à¤¾à¤°à¤¤ के राजà¥à¤¯à¥‹à¤‚ में जमà¥à¤®à¥‚-कशà¥à¤®à¥€à¤°, उतà¥à¤¤à¤°à¤¾à¤–ंड, पंजाब, हरियाणा, महाराषà¥à¤Ÿà¥à¤°, करà¥à¤¨à¤¾à¤Ÿà¤•, उतà¥à¤¤à¤° पà¥à¤°à¤¦à¥‡à¤¶, राजसà¥à¤¥à¤¾à¤¨ à¤à¤µà¤‚ पशà¥à¤šà¤¿à¤® बंगाल के नाम शामिल हैं। वैसे तो इसकी खेती à¤à¤¾à¤°à¤¤ के पà¥à¤°à¤¤à¥à¤¯à¥‡à¤• कà¥à¤·à¥‡à¤¤à¥à¤° में की जाती है, परनà¥à¤¤à¥ à¤à¤¾à¤°à¤¤ की दोमट मिटà¥à¤Ÿà¥€ जिसका पीà¤à¤š मान 6.0- 7.0 हो à¤à¤µà¤‚ जिसमें हà¥à¤¯à¥‚मस अधिक मातà¥à¤°à¤¾ में हो, आदरà¥à¤¶ होती है। गà¥à¤²à¤¾à¤¬ के लिठरेतीली मिटà¥à¤Ÿà¥€ सबसे अचà¥à¤›à¥€ जड़ जमाने वाली मिटà¥à¤Ÿà¥€ होती है।
गà¥à¤²à¤¾à¤¬ की खेती गमलों में, घर के पिछवाड़े, खेतों, छतों या घर के अंदर की जा सकती है। लेकिन वà¥à¤¯à¤µà¤¸à¤¾à¤¯à¤¿à¤• तौर पर गà¥à¤²à¤¾à¤¬ की खेती खà¥à¤²à¥€ हवा à¤à¤µà¤‚ पॉलीहाउस दोनों में किया जा सकता है। वहीठडच जैसे गà¥à¤²à¤¾à¤¬ की कà¥à¤› हाई कà¥à¤µà¤¾à¤²à¤¿à¤Ÿà¥€ वाली हाइबà¥à¤°à¤¿à¤¡ किसà¥à¤®à¥‡à¤‚ हैं जिसके लिठमà¥à¤–à¥à¤¯ रूप से पॉलीहाउस में उगाना ही उपयà¥à¤•à¥à¤¤ हैं, जहाठपरà¥à¤¯à¤¾à¤µà¤°à¤£ की सà¥à¤¥à¤¿à¤¤à¤¿à¤¯à¤¾à¤ नियंतà¥à¤°à¤£ में होती हैं। कमरà¥à¤¶à¤¿à¤¯à¤² लेवल पर गà¥à¤²à¤¾à¤¬ की खेती अतà¥à¤¯à¤§à¤¿à¤• लाà¤à¤¦à¤¾à¤¯à¤• हो सकती है कà¥à¤¯à¥‹à¤‚कि कटे हà¥à¤ फूलों à¤à¤µà¤‚ फूलों की सजावट, गà¥à¤²à¤¦à¤¸à¥à¤¤à¥‡ बनाने, उपहार देने के साथ-साथ गà¥à¤²à¤¾à¤¬ जल, गà¥à¤²à¤•ंद, इतà¥à¤° à¤à¤µà¤‚ कॉसà¥à¤®à¥‡à¤Ÿà¤¿à¤•à¥à¤¸ जैसे गà¥à¤²à¤¾à¤¬ से बनाठजाने वाले पà¥à¤°à¥‹à¤¡à¤•à¥à¤Ÿà¥à¤¸ की मांग बà¥à¤¨à¥‡ से गà¥à¤²à¤¾à¤¬ के फूलों की à¤à¥€ मांग बढ़ रही है।
चाहे छोटे सà¥à¤¤à¤° पर या कमरà¥à¤¶à¤¿à¤¯à¤² सà¥à¤¤à¤° पर गà¥à¤²à¤¾à¤¬ की खेती की जाà¤, दोनों के लिठजरà¥à¤°à¥€ है मिटà¥à¤Ÿà¥€ की उचित तैयारी। बिना मिटà¥à¤Ÿà¥€ के उचित शोधन किये हम बेहतर गà¥à¤£à¤µà¤¤à¥à¤¤à¤¾ वाले गà¥à¤²à¤¾à¤¬ के फूल पà¥à¤°à¤¾à¤ªà¥à¤¤ नहीं कर पायेंगें।
गà¥à¤²à¤¾à¤¬ के बीज की तैयारी सामानà¥à¤¯à¤¤à¤ƒ कटिंग या गà¥à¤°à¤¾à¤«à¥à¤Ÿà¤¿à¤‚ग दà¥à¤µà¤¾à¤°à¤¾ की जाती है। बीज से पौधा तैयार करने की विधि à¤à¥€ अपनाई जाती है, लेकिन यह पà¥à¤°à¤•à¥à¤°à¤¿à¤¯à¤¾ धीमी होती है।
गà¥à¤²à¤¾à¤¬ को मानसून के बाद लगाया जाना चाहिà¤, लेकिन सबसे अचà¥à¤›à¤¾ समय सितंबर से अकà¥à¤Ÿà¥‚बर है। वहीठपहाड़ी कà¥à¤·à¥‡à¤¤à¥à¤°à¥‹à¤‚ में इसकी रोपाई का सबसे अचà¥à¤›à¤¾ समय फरवरी à¤à¤µà¤‚ मारà¥à¤š का महिना है।
खेतों में लगà¤à¤— à¤à¤• फीट ऊà¤à¤šà¥€ बेड बनाने के बाद 3 फीट के अंतराल पर गà¥à¤²à¤¾à¤¬ के कटिंग तने/कलम की रोपाई की जानी चाहिà¤à¥¤ कलम आप नरà¥à¤¸à¤°à¥€ से ला सकते हैं, या यदि आपके पास पौधे हों पहले से तो खà¥à¤¦ कलम की कटिंग कर सकते हैं। उलà¥à¤²à¥‡à¤–नीय है कि कलम नà¥à¤¯à¥‚नतम 3 महीने पà¥à¤°à¤¾à¤¨à¥‡ पौधे से ही निकाले जाने चाहिà¤à¥¤ धà¥à¤¯à¤¾à¤¨ रहे गà¥à¤²à¤¾à¤¬ का कलम तैयार की गयी मिटà¥à¤Ÿà¥€ से बनाठगठबेड पर लगाते समय मिटà¥à¤Ÿà¥€ में नमी बनी रहनी चाहिà¤, ताकि पौधे अपने आइडियल टाइम में विकसित हो पाà¤à¤‚।
मिटà¥à¤Ÿà¥€ की तैयारी à¤à¤µà¤‚ पौधे की रोपाई तक ही कारà¥à¤¯ समापà¥à¤¤ नहीं हो जाता बलà¥à¤•ि पौधे के पà¥à¤°à¤¾à¤°à¤‚à¤à¤¿à¤• विकास, परिपकà¥à¤µ होने से लेकर फूलों की तोड़ाई तक फसल की नियमित देखà¤à¤¾à¤² की जरà¥à¤°à¤¤ होती है। इसमें कटाई-छंटाई à¤à¤µà¤‚ विटरिंग सहित अनà¥à¤¯ कà¥à¤°à¤¿à¤¯à¤¾à¤à¤‚ शामिल है।
अगर आप बेहतर गà¥à¤²à¤¾à¤¬ का फूल पà¥à¤°à¤¾à¤ªà¥à¤¤ करना चाहते हैं तो कटाई-छंटाई पौधे की रोपाई के बाद की सबसे पà¥à¤°à¤®à¥à¤– कà¥à¤°à¤¿à¤¯à¤¾ है। इसके अंतरà¥à¤—त हम सà¥à¤µà¤¸à¥à¤¥ शाखाओं को छोड़कर सà¤à¥€ सूखे à¤à¤µà¤‚ बीमारयà¥à¤•à¥à¤¤ शाखा को काट के हटा देते हैं। इसके साथ ही इसमें सà¥à¤µà¤¸à¥à¤¥ शाखाओं की छटाई यानी छोटा करते हैं।
इसके साथ ही विटरिंग कà¥à¤°à¤¿à¤¯à¤¾ नही की जानी चाहिà¤, जिसमें हम जड़ों से थोड़ी मिटà¥à¤Ÿà¥€ को हटाकर जड़ों को 7 से 10 दिनों तक खà¥à¤²à¥€ हवा में छोड़ देते हैं। इसके बाद हटाये गठमिटà¥à¤Ÿà¥€ में कमà¥à¤ªà¥‹à¤¸à¥à¤Ÿ मिलाकर फिर जड़ों को ढक देते हैं। इस कà¥à¤°à¤¿à¤¯à¤¾ से जड़ों को पौध के विकास के लिठआवशà¥à¤¯à¤• पोषक ततà¥à¤µà¥‹à¤‚ की उपलबà¥à¤§à¤¤à¤¾ कराई जाती है।
इसके साथी ही पौधे के आस-पास उगने वाले अनावशà¥à¤¯à¤• खरपतवार को निकाई-गà¥à¥œà¤¾à¤ˆ कर हटाने के साथ-साथ ही समय-समय पर सिंचाई करने की à¤à¥€ आवशà¥à¤¯à¤•ता है। पानी की कमी से पौधे सूख जाते हैं, à¤à¤µà¤‚ उपयà¥à¤•à¥à¤¤ विकास नहीं कर पाते हैं। इसलिठमिटà¥à¤Ÿà¥€ को हमेशा नम बनाठरखना आवशà¥à¤¯à¤• है।
पà¥à¤°à¤¾à¤¯à¤ƒ हर फसल रोग à¤à¤µà¤‚ कीटों के आकà¥à¤°à¤®à¤£ से पà¥à¤°à¤à¤¾à¤µà¤¿à¤¤ होते हैं, यदि समय रहते उनपर काबू ना पाया जाठतो किसानों की पूरी फसल नषà¥à¤Ÿ हो सकती है। गà¥à¤²à¤¾à¤¬ में à¤à¥€ कीटों à¤à¤µà¤‚ रोगों का आकà¥à¤°à¤®à¤£ होता है, जिससे फसल को समय पर बचाना आवशà¥à¤¯à¤• है। गà¥à¤²à¤¾à¤¬ को नà¥à¤•सान पहà¥à¤à¤šà¤¾à¤¨à¥‡ वाले कीटों/कीड़ों में दीमक, रेड सà¥à¤•ेल, जैसिडी, लाही (माहो) के नाम पà¥à¤°à¤®à¥à¤– रूप से आते हैं। इसके थीमेट नाम की दावा होती है, जिसे उपयà¥à¤•à¥à¤¤ मातà¥à¤°à¤¾ में मिटà¥à¤Ÿà¥€ में मिलाने से इन कीड़ों का पà¥à¤°à¤•ोप समापà¥à¤¤ हो जाता है। वहीठरेड सà¥à¤•ेल, जैसिडी पर नियंतà¥à¤°à¤£ के लिठसेविन या मालाथियान का छिडकाव कर सकते हैं।
गà¥à¤²à¤¾à¤¬ में छंटाई के बाद कटे à¤à¤¾à¤— पर लगने वाली à¤à¤• बीमारी डाईबैक है, जिसके फैलने से पौधे जड़ तक सूख जाते हैं। इस बीमारी से बचाव के लिठतने की कटाई समय ही कटे à¤à¤¾à¤— पर चौबटिया पेसà¥à¤Ÿ (4 अंश कॉपर कारà¥à¤¬à¥‹à¤¨à¥‡à¤Ÿ + 4 à¤à¤¾à¤— रेड लेड + 5 à¤à¤¾à¤— तीसी का तेल) à¤à¤µà¤‚ मालाथियान का छिडकाव करना चाहिà¤à¥¤
इसके अलावे बà¥à¤²à¥ˆà¤• सà¥à¤ªà¥‰à¤Ÿ à¤à¤µà¤‚ पाउडरी मिलà¥à¤¡à¥à¤¯à¥‚ जैसी बिमारियों का पà¥à¤°à¤•ोप à¤à¥€ गà¥à¤²à¤¾à¤¬ के पौधे पर होता है। इसकी रोकथाम के लिठकेराथेन या सलà¥à¤«à¥‡à¤•à¥à¤¸ का छिडकाव करना चाहिà¤à¥¤
गà¥à¤²à¤¾à¤¬ की खेती में खेत का पूरा ले आउट कर जो बेड/कà¥à¤¯à¤¾à¤°à¤¿à¤¯à¤¾à¤‚ बनायीं जाती है, उसकी आपस में दूरी à¤à¤• से डेॠमीटर रखी जाती है। इस गैप का उपयोग किसान अनà¥à¤¯ फसल के लिठकर सकते हैं। इन गैपà¥à¤¸ यानी दो बेड के बीच के बचे जगह की निराई-गà¥à¥œà¤¾à¤ˆ कर गà¥à¤²à¤¾à¤¬ के साथ-साथ किसान मेथी, पालक, धनियाठà¤à¤µà¤‚ अरबी की खेती कर सकते हैं।
गà¥à¤²à¤¾à¤¬ की वैजà¥à¤žà¤¾à¤¨à¤¿à¤• à¤à¤µà¤‚ योजनाबदà¥à¤§ खेती से किसान à¤à¤¾à¤ˆ अचà¥à¤›à¤¾ मà¥à¤¨à¤¾à¤«à¤¾ कमा सकते हैं। इसके लिठसही जलवायà¥, मिटà¥à¤Ÿà¥€, उनà¥à¤¨à¤¤ तकनीक à¤à¤µà¤‚ नियमित देखà¤à¤¾à¤² की जरà¥à¤°à¤¤ होती है। यदि आप थोड़े तकनीकी जà¥à¤žà¤¾à¤¨ à¤à¤µà¤‚ बाजार की समठके साथ खेती करें, तो गà¥à¤²à¤¾à¤¬ आपकी आमदनी को कई गà¥à¤¨à¤¾ बढ़ा सकता है। हमनें इस आरà¥à¤Ÿà¤¿à¤•ल में गà¥à¤²à¤¾à¤¬ की वैजà¥à¤žà¤¾à¤¨à¤¿à¤• खेती से संबंधित संà¤à¥€ आवशà¥à¤¯à¤• जानकारी को समेटने का पà¥à¤°à¤¯à¤¾à¤¸ किया है।