कदà¥à¤¦à¥‚ कà¥à¤² के इस शबà¥à¤œà¥€ को आमतौर पर खीरा, तोरी à¤à¤µà¤‚ लौकी जैसी बेल वाली सबà¥à¤œà¤¿à¤¯à¥‹à¤‚ के समान उगाया जाता है। परवल का उतà¥à¤ªà¤¾à¤¦à¤¨ पà¥à¤°à¤®à¥à¤– रूप से उतà¥à¤¤à¤° पà¥à¤°à¤¦à¥‡à¤¶, बिहार, à¤à¤¾à¤°à¤–णà¥à¤¡, मधà¥à¤¯ पà¥à¤°à¤¦à¥‡à¤¶ à¤à¤µà¤‚ उड़ीसा जैसें à¤à¤¾à¤°à¤¤à¥€à¤¯ राजà¥à¤¯à¥‹à¤‚ में किया जाता है।
परवल की खेती के लिठसामानà¥à¤¯à¤¤à¤ƒ गरà¥à¤® à¤à¤µà¤‚ आरà¥à¤¦à¥à¤° जलवायॠउपयà¥à¤•à¥à¤¤ होती है। इसकी वृदà¥à¤§à¤¿ के लिठ25°C से 35°C तक का तापमान आइडियल होता है। परवल की खेती के लिठहलà¥à¤•ी नमी की आवशà¥à¤¯à¤•ता होती है, लेकिन पानी जमा होने से बचाना चाहिà¤à¥¤ वहीं मिटटी में, परवल की खेती के लिठबलà¥à¤ˆ दोमट या जैविक पदारà¥à¤¥à¥‹à¤‚ से à¤à¤°à¤ªà¥‚र मिटटी उपयà¥à¤•à¥à¤¤ होती है। नदी किनारे की जलोॠमिटà¥à¤Ÿà¥€ बेसà¥à¤Ÿ होती है। जल निकासी वाली मिटटी परवल की खेती के लिठसबसे उपयà¥à¤•à¥à¤¤ मानी जाती है।
काशी सà¥à¤«à¤²- यह किसà¥à¤® उतà¥à¤¤à¤° पà¥à¤°à¤¦à¥‡à¤¶ à¤à¤µà¤‚ बिहार की मिटटी à¤à¤µà¤‚ जलवायॠके अनà¥à¤¸à¤¾à¤° उपयà¥à¤•à¥à¤¤ मानी जाती है। इस किसà¥à¤® के फल सफ़ेद धारीदार के साथ हलà¥à¤•े हरे रंग के होते हैं। इस किसà¥à¤® के परवल मिठाई बनाने के लिठसबसे उपयà¥à¤•à¥à¤¤ माने जाते हैं।
काशी अलंकार- परवल की यह किसà¥à¤® उतà¥à¤¤à¤° पà¥à¤°à¤¦à¥‡à¤¶, बिहार, à¤à¤¾à¤°à¤–णà¥à¤¡ पà¥à¤°à¤¦à¥‡à¤¶ में खेती के लिठउपयà¥à¤•à¥à¤¤ है। यह अधिक उपज वाली किसà¥à¤® है। इस किसà¥à¤® के फल हलà¥à¤•े हरे रंग के होते हैं। इसकी किसà¥à¤® की à¤à¤• खासियत है कि इनके फलों में बहà¥à¤¤ ही मà¥à¤²à¤¾à¤¯à¤® बीज होता है।
सà¥à¤µà¤°à¥à¤£ रेखा: इसके फल लमà¥à¤¬à¥‡ धारीदार हरे रंग के होते हैं। काशी अलंकार के सामान ही इस किसà¥à¤® के फलों का बीज मà¥à¤²à¤¾à¤¯à¤® होता है।
सà¥à¤µà¤°à¥à¤£ अलौकिक: इसका रंग हलà¥à¤•ा हर होता है à¤à¤µà¤‚ यह मिठाई बनाने के लिठउपयà¥à¤•à¥à¤¤ माने जाते हैं।
सà¥à¤¥à¤¾à¤¨ विशेष की जलवायॠके अनà¥à¤¸à¤¾à¤° परवल की रोपाई का समय à¤à¤¿à¤¨à¥à¤¨-à¤à¤¿à¤¨à¥à¤¨ सà¥à¤¥à¤¾à¤¨à¥‹à¤‚ पर अलग-अलग होता है। मैदानी कà¥à¤·à¥‡à¤¤à¥à¤°à¥‹à¤‚ में परवल की रोपाई जà¥à¤²à¤¾à¤ˆ से अकà¥à¤Ÿà¥‚बर तक à¤à¤µà¤‚ दियारा कà¥à¤·à¥‡à¤¤à¥à¤°à¥‹à¤‚ में सितंबर से अकà¥à¤Ÿà¥‚बर तक मानी जाती है।
परवल की खेती के लिठसबसे पहले à¤à¥‚मि का चà¥à¤¨à¤¾à¤µ आवशà¥à¤¯à¤• है। इसके लिठà¤à¥‚मि ऊà¤à¤šà¥€ होनी चाहिठताकि फसल के पूरी जीवनकाल में पानी जमाव की समसà¥à¤¯à¤¾ ना आà¤à¥¤ अगर बारिश वाला पà¥à¤°à¤¦à¥‡à¤¶ हो, तो वहां समतल खेतों में à¤à¥€ ऊà¤à¤šà¥‡-ऊà¤à¤šà¥‡à¤‚ थाले या मेॠबनाकर फसल लगाने चाहिà¤, ताकि जमीन में पानी जमाव की समसà¥à¤¯à¤¾ ना आà¤à¥¤ परवल को 3 तरीके से लगाया जा सकता है, जो निमà¥à¤¨ है:
फसल लगाने की उपरà¥à¤¯à¥à¤•à¥à¤¤ बताये गठतरीकों में पहली दो विधियाठकारगर नहीं है। बीज को सीधे लगाने से जो पौधे निकलते हैं, उसमें से लगà¤à¤— 60 से 80 पà¥à¤°à¤¤à¤¿à¤¶à¤¤ नर पौधे होते हैं। उलà¥à¤²à¥‡à¤–नीय है कि मादा पौधे में फल आता है, इस पà¥à¤°à¤•ार पौधे की बहà¥à¤¤ बड़ी संखà¥à¤¯à¤¾ हमारे काम की नहीं होती है। 10 मादा में केवल 1 नर पौधे की जरà¥à¤°à¤¤ होती है। इस पà¥à¤°à¤•ार यह विधि लाà¤à¤¦à¤¾à¤¯à¤• नहीं है। जड़ों की कलम वाली विधि से पौधे तो जलà¥à¤¦à¥€ बà¥à¤¤à¥‡ हैं, लेकिन इसकी à¤à¤• समसà¥à¤¯à¤¾ है, जड़ वाली कलमों का उपलबà¥à¤§ ना होना। तीसरी विधि ही सबसे जà¥à¤¯à¤¾à¤¦à¤¾ कारगर मानी जाती है, जिसके तहत सीधे लता को गडà¥à¤¢à¥‡ में शोधित मिटटी के साथ लगाया जाता है। आप वैसे किसान जो पहले से परवल की खेती करते हैं, उनसे सीधे लता खरीद सकते हैं, à¤à¤µà¤‚ अपने खेतों में इसकी रोपाई कर सकते हौं, इसकी बाजार मूलà¥à¤¯ सामानà¥à¤¯à¤¤à¤ƒ 7 से 8 रूपये मीटर की होती है।
नठपौधे का विकास उचित तरीके से हो सके, और पानी के अधिक संपरà¥à¤• में परवल की बेलियाठन आ सके इसके लिठदो तरह के तरीके अपनाठजाते हैं। पहली विधि में जमीन पर पैरा बिछाठजाते हैं, जिसके लिठफसल अवशेष के डंठल का पà¥à¤°à¤¯à¥‹à¤— किया जाता है। à¤à¤¸à¤¾ करने से परवल की बेलियाठसीधे जमीन के संपरà¥à¤• में नहीं आती है à¤à¤µà¤‚ नमी का उचित सà¥à¤¤à¤° बरकरार रहता है। दूसरे तरीके में बांस की 6 से 7 फीट की बलà¥à¤²à¤¿à¤¯à¥‹à¤‚ का पà¥à¤°à¤¯à¥‹à¤— कर ऊà¤à¤šà¤¾à¤ˆ पर मचान बनाठजाते हैं।
परवल के फसल की निरंतर देखà¤à¤¾à¤² करनी आवशà¥à¤¯à¤• है। रोपाई के बाद से फसल लगने तक 4 से 5 बार निकाई गà¥à¥œà¤¾à¤ˆ करनी आवशà¥à¤¯à¤• है, ताकि लताओं की वृदà¥à¤§à¤¿ हो सके। इसके साथ ही परवल की बेलों की देखà¤à¤¾à¤² में नियमित पानी देना, बेलों को सहारा देना, खरपतवारों की सफाई à¤à¤µà¤‚ आवशà¥à¤¯à¤•तानà¥à¤¸à¤¾à¤° समय-समय पर उरà¥à¤µà¤°à¤•ों का उपयोग शामिल है। शà¥à¤°à¥à¤†à¤¤ में पानी की अधिक आवशà¥à¤¯à¤•ता होती है, लेकिन परवल के पौधों को अधिक पानी जमा होने से बचाना चाहिà¤à¥¤ इसके अलावा, बेलों को धूप से बचाने के लिठकिसी पà¥à¤°à¤•ार की छांव का इंतजाम à¤à¥€ किया जा सकता है। इसके साथ ही हानि पहà¥à¤à¤šà¤¾à¤¨à¥‡ वाले कीटों से à¤à¥€ परवल के बेलों की रकà¥à¤·à¤¾ करनी होगी।
मैदानी कà¥à¤·à¥‡à¤¤à¥à¤°à¥‹à¤‚ में मारà¥à¤š से अपà¥à¤°à¥ˆà¤² महीने में फल आना शà¥à¤°à¥‚ हो जाता है। वहीठनदी के किनारे वाले दियारा कà¥à¤·à¥‡à¤¤à¥à¤°à¥‹à¤‚ में पौधे पर फल फरवरी में ही नाने लगते हैं। फल के आने के 15 से 16 दिनों के बाद इसकी तà¥à¥œà¤¾à¤ˆ की जा सकती है। धà¥à¤¯à¤¾à¤¨ रहे फल की समय से तà¥à¥œà¤¾à¤ˆ करते रहनी चाहिà¤, à¤à¤• तो इससे आपको निरंतर आमदनी होते रहेंगी, दूसरी इससे अधिक संखà¥à¤¯à¤¾ में फल लगते हैं। यानी फल की तà¥à¥œà¤¾à¤ˆ फसल पैदावार को बà¥à¤¾à¤¨à¥‡ का काम करते हैं।
परवल में नर à¤à¤µà¤‚ मादा पà¥à¤·à¥à¤ª अलग अलग पौधे में लगते हैं, इसलिठबेहतर उपज के लिठजरà¥à¤°à¥€ है नर à¤à¤µà¤‚ मादा पà¥à¤·à¥à¤ª वाले पौधे का संतà¥à¤²à¤¨ होना। फसल के उपयà¥à¤•à¥à¤¤ विकास के लिठ10 मादा पौधे में कम से कम à¤à¤• नर पौधे का होना अति आवशà¥à¤¯à¤• है।
हमनें इस आरà¥à¤Ÿà¤¿à¤•ल में परवल की खेती से जà¥à¥œà¥€ सà¤à¥€ आवशà¥à¤¯à¤• जानकारी देने का पà¥à¤°à¤¯à¤¾à¤¸ किया है। आशा है जो किसान परवल की खेती करना चाहते हैं, वे इस लेख के माधà¥à¤¯à¤® से जरà¥à¤°à¥€ जानकारी पà¥à¤°à¤¾à¤ªà¥à¤¤ कर पाà¤à¤‚गें। परवल की वैजà¥à¤žà¤¾à¤¨à¤¿à¤• खेती à¤à¤• लाà¤à¤•ारी वà¥à¤¯à¤µà¤¸à¤¾à¤¯ हो सकता है यदि उचित तरीके से à¤à¤µà¤‚ सही समय पर इसे उगाया जाà¤à¥¤ सही जलवायà¥, मिटटी, देखà¤à¤¾à¤² à¤à¤µà¤‚ सही किसà¥à¤® का चà¥à¤¨à¤¾à¤µ इसे à¤à¤• सफल कृषि वà¥à¤¯à¤µà¤¸à¤¾à¤¯ बना सकती हैं।