खीरे की उतà¥à¤ªà¤¤à¥à¤¤à¤¿ मूलतः à¤à¤¾à¤°à¤¤ से ही हà¥à¤¯à¥€ है,जो पोषक ततà¥à¤µà¥‹à¤‚ से à¤à¤°à¤ªà¥‚र à¤à¤• लोकपà¥à¤°à¤¿à¤¯ सबà¥à¤œà¥€ है, जिसकी देश के लगà¤à¤— हर हिसà¥à¤¸à¥‡ में उपज होती है। यह सà¥à¤µà¤¾à¤¸à¥à¤¥à¥à¤¯ के साथ-साथ आरà¥à¤¥à¤¿à¤• दृषà¥à¤Ÿà¤¿ से लाà¤à¤•ारी होता है। इसमें जल, कारà¥à¤¬à¥‹à¤¹à¤¾à¤‡à¤¡à¥à¤°à¥‡à¤Ÿ, पà¥à¤°à¥‹à¤Ÿà¥€à¤¨ à¤à¤µà¤‚ मिनरलà¥à¤¸ पाठजाते हैं। इसकी डिमांड मारà¥à¤•ेट में हमेशा बनी रहती है, जिससे किसानों को इसकी अचà¥à¤›à¥€ कीमत à¤à¥€ मिलती है। à¤à¤¾à¤°à¤¤à¥€à¤¯ खाने में जितना सलाद का महतà¥à¤¤à¥à¤µ है, उतना ही सलाद में खीरे का महतà¥à¤¤à¥à¤µ है। सà¥à¤µà¤¾à¤¸à¥à¤¥à¥à¤¯ की दृषà¥à¤Ÿà¤¿ से जैसे सलाद के बिना à¤à¥‹à¤œà¤¨ की पूरà¥à¤£à¤¤à¤¾ नहीं मानी जाती है, वैसे ही खीरे के अà¤à¤¾à¤µ में सलाद को पूरà¥à¤£ नहीं माना जाता है। आज हम इस आरà¥à¤Ÿà¤¿à¤•ल के माधà¥à¤¯à¤® से आपको खीरे के महतà¥à¤¤à¥à¤µ, खीरे के लिठउपयà¥à¤•à¥à¤¤ मिटटी à¤à¤µà¤‚ जलवायà¥, खीरे की उनà¥à¤¨à¤¤ किसà¥à¤®à¥‡à¤‚, खीरे की खेती की वैजà¥à¤žà¤¾à¤¨à¤¿à¤• विधि, सहित खीरे की खेती से जà¥à¥œà¥€ सà¤à¥€ आवशà¥à¤¯à¤• जानकारी साà¤à¤¾ करने का पà¥à¤°à¤¯à¤¾à¤¸ करेंगें।
वैसे तो ये गरà¥à¤®à¥€ के मौसम की फसल है, लेकिन इसे किसानों दà¥à¤µà¤¾à¤°à¤¾ वरà¥à¤·-à¤à¤° उगाया जा सकता है। आज नई तकनीकों, बीज की उपलबà¥à¤§ विà¤à¤¿à¤¨à¥à¤¨ किसà¥à¤®à¥‹à¤‚ ने खीरे की फसल को उषà¥à¤£à¤•टिबंधीय, उपोषà¥à¤£à¤•टिबंधीय à¤à¤µà¤‚ शीतोषà¥à¤£ कà¥à¤·à¥‡à¤¤à¥à¤°à¥‹à¤‚ में खीरे को सफलतापूरà¥à¤µà¤• उगाया जाना संà¤à¤µ बना दिया है। इसकी खेती के लिठनà¥à¤¯à¥‚नतम 20 डिगà¥à¤°à¥€ सेलà¥à¤¸à¤¿à¤¯à¤¸ à¤à¤µà¤‚ अधिकतम 40 डिगà¥à¤°à¥€ सेलà¥à¤¸à¤¿à¤¯à¤® का तापमान आइडियल माना जाता है। अगर तापमान 25 डिगà¥à¤°à¥€ से 30 डिगà¥à¤°à¥€ सेलà¥à¤¸à¤¿à¤¯à¤® में मेंटेन रखा जाठतो फसल की पैदावार बॠजाती है।
खीरे की फसल के लिठबलà¥à¤ˆ दोमट/रेतीली मिटटी उपयà¥à¤•à¥à¤¤ मानी जाती है। धà¥à¤¯à¤¾à¤¨ रहे इसकी खेती वैसी à¤à¥‚मि पर ही की जानी चाहिà¤, जहाठउचित जलनिकासी का पà¥à¤°à¤¬à¤‚धन किया गया हो ताकि जलजमाव की समसà¥à¤¯à¤¾ ना हो। खीरे की फसल के लिठकारà¥à¤¬à¤¨ की मातà¥à¤°à¤¾ वाली à¤à¥‚मि अधिक उपयà¥à¤•à¥à¤¤ होती है, जिसका पीà¤à¤š मान 6.5 से 7 के बीच हो।
कृषि विजà¥à¤žà¤¾à¤¨ तेजी से विकास कर रहा है, हमारे कृषि वैजà¥à¤žà¤¾à¤¨à¤¿à¤•ों ने à¤à¤¾à¤°à¤¤à¥€à¤¯ जलवायॠके अनà¥à¤•ूल बहà¥à¤¤ सी हाइबà¥à¤°à¤¿à¤¡ किसà¥à¤®à¥‹à¤‚ का à¤à¥€ विकास किया है। आप लेटेसà¥à¤Ÿ हाइबà¥à¤°à¤¿à¤¡ किसà¥à¤® की जानकारी पà¥à¤°à¤¾à¤ªà¥à¤¤ करने के लिठà¤à¤¾à¤°à¤¤à¥€à¤¯ कृषि अनà¥à¤¸à¤‚धान संसà¥à¤¥à¤¾à¤¨ के पोरà¥à¤Ÿà¤² पर उपलबà¥à¤§ ‘बीज उपलबà¥à¤§’ सेकà¥à¤¶à¤¨ में दिठसंपरà¥à¤• नंबर पर कॉल कर सकते हैं। हम आइये आपको खीरे की आम पà¥à¤°à¤šà¤²à¤¿à¤¤ किसà¥à¤®à¥‹à¤‚ की जानकारी देते हैं। जो उपज के साथ-साथ देश की जलवायॠके à¤à¥€ अनà¥à¤•ूल है।
सà¥à¤µà¤°à¥à¤£ अगेती- जैसा नाम से ही पता चलता है, यह खीरे की अगेती किसà¥à¤® है, जिसकी तà¥à¥œà¤¾à¤ˆ सबसे जलà¥à¤¦à¥€ की जा सकती है। बà¥à¤†à¤ˆ के 40 से 42 दिनों के बाद ही इसका फल तोड़ने लायक परिपकà¥à¤µ होने लगता हैं। ये आकार में मधà¥à¤¯à¤® होने के साथ, इसके फल कà¥à¤°à¤¿à¤¸à¥à¤ªà¥€ à¤à¤µà¤‚ हलà¥à¤•े हरेपन लिठहोते हैं। सà¥à¤µà¤°à¥à¤£ अगेती की बà¥à¤†à¤ˆ फरवरी से जून के महीने तक की जा सकती है। ये उतà¥à¤ªà¤¾à¤¦à¤¨ की दृषà¥à¤Ÿà¤¿ से उनà¥à¤¨à¤¤ बीज होता है, इसके दà¥à¤µà¤¾à¤°à¤¾ सामानà¥à¤¯à¤¤à¤ƒ पà¥à¤°à¤¤à¤¿ पौधे 15 खीरे पà¥à¤°à¤¾à¤ªà¥à¤¤ होते हैं, जिसकी तोड़ाई किसानों दà¥à¤µà¤¾à¤°à¤¾ 5 से 6 दिनों के अनà¥à¤¤à¤°à¤¾à¤² में की जा सकती है।
सà¥à¤µà¤°à¥à¤£ पूरà¥à¤£à¤¿à¤®à¤¾- सà¥à¤µà¤°à¥à¤£ अगेती की तà¥à¤²à¤¨à¤¾ में सà¥à¤µà¤°à¥à¤£ पूरà¥à¤£à¤¿à¤®à¤¾ के फल विकसित होने में थोड़ा अधिक समय लेता है। यह मधà¥à¤¯à¤® अवधि में तैयार होने वाली खीरे की किसà¥à¤® है, जिसकी तà¥à¥œà¤¾à¤ˆ फसल की बà¥à¤†à¤ˆ के 45 से 47 दिनों के बाद शà¥à¤°à¥‚ हो जाती है। इसके फल हलà¥à¤•े हरे, लमà¥à¤¬à¥‡, सीधे à¤à¤µà¤‚ ठोस होते हैं। इसकी तà¥à¥œà¤¾à¤ˆ 2 से 3 दिन के अनà¥à¤¤à¤°à¤¾à¤² में करनी चाहिà¤à¥¤
पंत-संकर खीरा-1- ऊपर बताये दोनों किसà¥à¤®à¥‹à¤‚ की अपेकà¥à¤·à¤¾ इस किसà¥à¤® से उगे फसल के परिपकà¥à¤µ होने का समय अधिक है। इसकी बà¥à¤†à¤ˆ से लेकर तà¥à¥œà¤¾à¤ˆ तक के समय का अनà¥à¤¤à¤°à¤¾à¤² 50 दिनों का होता है। इसके फल हरेपन लिठमधà¥à¤¯à¤® आकार के होते हैं। यह संकर पà¥à¤°à¤œà¤¾à¤¤à¤¿, विशेषकर पहाड़ी कà¥à¤·à¥‡à¤¤à¥à¤°à¥‹à¤‚ à¤à¤µà¤‚ मैदानी à¤à¤¾à¤—ों के लिठउपयà¥à¤•à¥à¤¤ मानी जाती है। इसकी तà¥à¥œà¤¾à¤ˆ 2 से 4 दिन के अनà¥à¤¤à¤°à¤¾à¤² में करनी चाहिà¤à¥¤
कà¥à¤·à¥‡à¤¤à¥à¤° à¤à¤µà¤‚ जलवायॠके हिसाब से खीरे की खेती का समय अलग-अलग है। मैदानी कà¥à¤·à¥‡à¤¤à¥à¤°à¥‹à¤‚ में बà¥à¤†à¤ˆ का उपयà¥à¤•à¥à¤¤ समय फरवरी से जून के पà¥à¤°à¤¥à¤® सपà¥à¤¤à¤¾à¤¹ तक है। à¤à¤¾à¤°à¤¤ के दकà¥à¤·à¤¿à¤£ कà¥à¤·à¥‡à¤¤à¥à¤°à¥‹à¤‚ में इसकी बà¥à¤†à¤ˆ जून से लेकर अकà¥à¤Ÿà¥‚बर तक करते हैं। वहीं उतà¥à¤¤à¤° à¤à¤¾à¤°à¤¤ के परà¥à¤µà¤¤à¥€à¤¯ à¤à¤¾à¤—ों में इसकी बà¥à¤†à¤ˆ का उपयà¥à¤•à¥à¤¤ समय अपà¥à¤°à¥ˆà¤² से मई के बीच है।
किसी à¤à¥€ बीज के उपयà¥à¤•à¥à¤¤ विकास के लिठमिटà¥à¤Ÿà¥€ की बेहतर तरीके से तैयारी करनी आवशà¥à¤¯à¤• है, कà¥à¤¯à¥‹à¤‚कि फसल अपने सà¥à¤µà¤¸à¥à¤¥ विकास के लिठमिटà¥à¤Ÿà¥€ से ही सà¤à¥€ जरà¥à¤°à¥€ पोषक ततà¥à¤µ लेते हैं। मिटà¥à¤Ÿà¥€ अगर नरम/à¤à¥à¤°à¤à¥à¤°à¥€ हो तो मिटà¥à¤Ÿà¥€ में जड़ का विकास à¤à¥€ बेहतर तरीके से हो पाता है। इसीलिठखीरे की खेती के लिठà¤à¥€ मिटà¥à¤Ÿà¥€ की बेहतर तैयारी के लिठसबसे पहले इसे कलà¥à¤Ÿà¥€à¤µà¥‡à¤Ÿà¤° के माधà¥à¤¯à¤® से दो से तीन बार जà¥à¤¤à¤¾à¤ˆ करनी आवशà¥à¤¯à¤• है। पहली जà¥à¤¤à¤¾à¤ˆ के बाद इसमें पà¥à¤°à¤¾à¤¨à¥‡ गोबर की खाद डालनी चाहिà¤, à¤à¤µà¤‚ उसके बाद पà¥à¤¨à¤ƒ दूसरी जà¥à¤¤à¤¾à¤ˆ करनी चाहिà¤, ताकि खाद पूरी तरह से मिटà¥à¤Ÿà¥€ में मिल सके। इसके बाद पूरे खेत की सिंचाई करके, कà¥à¤› दिनों तक खेत को à¤à¤¸à¥‡ ही छोड़ देनी चाहिà¤à¥¤ इसके बाद पà¥à¤¨à¤ƒ तीसरी बार जà¥à¤¤à¤¾à¤ˆ करनी चाहिà¤à¥¤ इस पूरे पà¥à¤°à¥‹à¤¸à¥‡à¤¸ में मिटà¥à¤Ÿà¥€ पूरी तरह à¤à¤• सà¥à¤µà¤¸à¥à¤¥ बीज के विकास के लिठअनà¥à¤•ूल हो जाती है।
मिटà¥à¤Ÿà¥€ की तैयारी के बाद सबसे पहले खेत में 2-3 सेंटीमीटर गहरी कà¥à¤¯à¤¾à¤°à¤¿à¤¯à¤¾à¤‚ तैयार कर लें। बीजों को कतारों में 60 से 75 सेंटीमीटर की दूरी पर लगाà¤à¤‚। बीजों को हलà¥à¤•े से मिटà¥à¤Ÿà¥€ से ढककर हलà¥à¤•े पानी से सिंचाई करें। यदि बीजों का अंकà¥à¤°à¤£ सही हो, तो साथ दिनों में पौधे उगने लगेंगे।
केवल खीरा की बà¥à¤†à¤ˆ कर देने तक ही किसानों का काम ख़तà¥à¤® नहीं हो जाता है। बà¥à¤†à¤ˆ à¤à¤µà¤‚ बेलों के सवसà¥à¤¥ विकास से लेकर फल तà¥à¥œà¤¾à¤ˆ तक आपको विशेष धà¥à¤¯à¤¾à¤¨ रखने की जरà¥à¤°à¤¤ है। सबसे पहले धà¥à¤¯à¤¾à¤¨ यह रखना है, आपको किसी पà¥à¤°à¤•ार के अवांछित पौधे à¤à¤µà¤‚ खर-पतवार को पनपने नहीं देना है। यानी समय-समय पर आपको निराई-गà¥à¥œà¤¾à¤ˆ करते रहनी है। इसके साथ ही आपको ये à¤à¥€ धà¥à¤¯à¤¾à¤¨ रखना है कि किसी पà¥à¤°à¤•ार के रोग का फसल के तने, फूलों या फलों में संकà¥à¤°à¤®à¤£ ना हो। इसके साथ ही कीटें à¤à¥€ फसलों को नà¥à¤•सान पहà¥à¤‚चाती है।
कदà¥à¤¦à¥‚ का लाल कीट (red pumpkin beetle)- इस कीट को कई जगह सà¥à¤‚डी के नाम से à¤à¥€ जाना जाता है। ये दिखने में लाल रंग के होते हैं, जो खीरे के विकास के दौरान पतà¥à¤¤à¤¿à¤¯à¥‹à¤‚ को खाते हैं। ये उन पतà¥à¤¤à¥‹à¤‚ का जà¥à¤¯à¤¾à¤¦à¤¾ नà¥à¤•सान पहà¥à¤à¤šà¤¾à¤¨à¥‡ का काम करते हैं, जो विकास की पà¥à¤°à¤¾à¤°à¤‚à¤à¤¿à¤• अवसà¥à¤¥à¤¾ में होती है। इसलिठपौधे के विकास के पà¥à¤°à¤¾à¤°à¤‚à¤à¤¿à¤• चरण में इन कीटों के आकà¥à¤°à¤®à¤£ की निगरानी रखनी है। पà¥à¤°à¥Œà¥ पतà¥à¤¤à¤¿à¤¯à¥‹à¤‚ को ये नà¥à¤•सान नहीं पहà¥à¤‚चाते हैं।
इसके रोकथाम के लिठसà¥à¤¬à¤¹ ओस पड़ने के समय पौधों पर राख का छिड़काव कर देना चाहिà¤à¥¤ इसके साथ ही जैविक विधि à¤à¤µà¤‚ कीटनाशी का पà¥à¤°à¤¯à¥‹à¤— कर à¤à¥€ आप इन कीटों से फसल का बचाव कर सकते हैं।
खीरे का फतंगा- ये à¤à¤• पà¥à¤°à¤•ार का उड़ने वाला कीट है, जिसके आगे के पंख सफ़ेद होते हैं, à¤à¤µà¤‚ किनारे पर टà¥à¤°à¤¾à¤‚सपेरेंट à¤à¥‚रे धबà¥à¤¬à¥‡ पाठजाते हैं। इस कीट का मà¥à¤–à¥à¤¯ à¤à¥‹à¤œà¤¨ पतà¥à¤¤à¥€ के कà¥à¤²à¥‹à¤°à¥‹à¤«à¤¿à¤² à¤à¤¾à¤— है, इसके साथ ही ये फूल à¤à¤µà¤‚ फलों को à¤à¥€ अपना à¤à¥‹à¤œà¤¨ बनाते हैं।
आप समय-समय पर इन कीटों को इकठà¥à¤ ा करके नषà¥à¤Ÿ कर सकते हैं। दूसरे उपाय में आप बैसिलस थà¥à¤°à¥‚जेंसिस किसà¥à¤® कà¥à¤°à¥à¤¸à¤Ÿà¤¾à¤•ी का छिड़काव à¤à¤• या दो बार 10 दिनों के अंतराल पर à¤à¤• किलोगà¥à¤°à¤¾à¤® पà¥à¤°à¤¤à¤¿ हेकà¥à¤Ÿà¥‡à¤¯à¤° की दर से कर सकते हैं।
कीटों के साथ-साथ आपको खीरे की फसलों में लगने वाले नीचे दिठसामानà¥à¤¯ रोग से बचाव करनी चाहिà¤à¥¤
वायरस से होने वाले रोग- यह मोजैक वायरस से होता है, जो खीरे की फसल के पतà¥à¤¤à¤¿à¤¯à¥‹à¤‚ à¤à¤µà¤‚ फलों को संकà¥à¤°à¤®à¤¿à¤¤ करता है। इस वायरस रोग की पहचान है, पतà¥à¤¤à¥€ का पीला पड़ जाना à¤à¤µà¤‚ पीले धबà¥à¤¬à¥‡ का निशान पड़ जाना। इस वायरस के संकà¥à¤°à¤®à¤£ की वजह से फल छोटे और टेà¥à¥‡-मेà¥à¥‡ हो जाते हैं। इसके बचाव के लिठà¤à¤• उपाय तो ये है कि इससे पà¥à¤°à¤à¤¾à¤µà¤¿à¤¤ पौधे को जड़ से उखाड़ दें, दूसरा इसके लिठबाजार में उपलबà¥à¤§ रासायनिक कीटनाशकों का à¤à¥€ पà¥à¤°à¤¯à¥‹à¤— कर सकते हैं।
रूट रॉट डिजीज- यह फफूंद से होने वाला रोग है, जो पौधे की जड़ों को पà¥à¤°à¤à¤¾à¤µà¤¿à¤¤ कर करता है। इस रोग की वजह से पौधे की जड़ें सड़ने या सूखने लगती है। जिससे पौधे जड़ों के माधà¥à¤¯à¤® से आवशà¥à¤¯à¤• पोषक ततà¥à¤µ नहीं गà¥à¤°à¤¹à¤£ कर पाते हैं। इस रोग का शà¥à¤°à¥‚आती लकà¥à¤·à¤£ है पतà¥à¤¤à¤¿à¤¯à¥‹à¤‚ का पीला पड़ जाना।
फसल इस रोग से पà¥à¤°à¤à¤¾à¤µà¤¿à¤¤ ना हो, इसके लिठबà¥à¤†à¤ˆ के पूरà¥à¤µ बीजों का उपचार करना चाहिà¤à¥¤ इसके लिठमारà¥à¤•ेट में उपलबà¥à¤§ फफूंदनाशक का à¤à¥€ पà¥à¤°à¤¯à¥‹à¤— कर सकते हैं।
पाउडरी मिलà¥à¤¡à¥à¤¯à¥‚ रोग- यह à¤à¤• फंगस जनित रोग है, जिसके लकà¥à¤·à¤£ पौधे के पतà¥à¤¤à¤¿à¤¯à¥‹à¤‚ à¤à¤µà¤‚ तनों पर दिखाई देते हैं। इस रोग के होने से पौधे के पतà¥à¤¤à¤¿à¤¯à¥‹à¤‚ à¤à¤µà¤‚ तनों पर पाउडर जैसा पदारà¥à¤¥ इकठà¥à¤ ा होने लगता है। रोग के अधिक बà¥à¤¨à¥‡ पर सारे पौधे के तने à¤à¤µà¤‚ पतà¥à¤¤à¤¿à¤¯à¤¾à¤‚ पाउडर से ढक जाते हैं।
इस रोग से फसल संकà¥à¤°à¤®à¤¿à¤¤ ना हो, इसके लिठकिसानों को बीजोपचार करके ही बà¥à¤†à¤ˆ करनी चाहिà¤à¥¤ इसके साथ ही बाजार में विà¤à¤¿à¤¨à¥à¤¨ पà¥à¤°à¤•ार के फंगसनाशी रसायन उपलबà¥à¤§ होते हैं, जिनका पà¥à¤°à¤¯à¥‹à¤— कर इस रोग से बचाव किया जा सकता है।
बहà¥à¤¤ से à¤à¤¸à¥‡ लोग होते हैं, जिनके पास बड़े पैमाने पर खेती के लिठजमीन नहीं होती है, लेकिन उनकी रूचि किचेन गारà¥à¤¡à¤¨à¤¿à¤‚ग की होती है। यानी वे अपने घरों के आहाते या फिर अपने घर के छतों पर खेती करना चाहते हैं। तो बता दें खीरा à¤à¤¸à¤¾ फसल है, जिसे आप छोटे पैमाने पर अपने घरों में उपलबà¥à¤§ जमीन या फिर घर के छतों या बालकनी में à¤à¥€ उपजा सकते हैं। इसके लिठआपको सामानà¥à¤¯ से बड़े गमले या फिर पà¥à¤²à¤¾à¤¸à¥à¤Ÿà¤¿à¤• के बोरे में खाद मिली हà¥à¤¯à¥€ मिटà¥à¤Ÿà¥€ लेनी है। आज बहà¥à¤¤ से à¤à¤¸à¥‡ ऑनलाइन साइटà¥à¤¸ उपलबà¥à¤§ हैं, जहाठसे आप ये ऑनलाइन मंगा सकते हैं। इसमें बीज की बà¥à¤†à¤ˆ कर आप इससे छोटे पैमाने पर खीरा उपजा सकते हैं। इसके लिठधूप का आना जरà¥à¤°à¥€ है, कà¥à¤¯à¥‹à¤‚कि यह In-door फसल नहीं है। इसके साथ ही समय-समय पर आपको सिंचाई à¤à¥€ करनी आवशà¥à¤¯à¤• है।
हमनें इस आरà¥à¤Ÿà¤¿à¤•ल में खीरे की खेती से समà¥à¤¬à¤¨à¥à¤§à¤¿à¤¤ सà¤à¥€ महतà¥à¤µà¤ªà¥‚रà¥à¤£ जानकारी को समेटने का पà¥à¤°à¤¯à¤¾à¤¸ किया है। हमारा उदà¥à¤¦à¥‡à¤¶à¥à¤¯ है किसानों को खीरे की खेती के वैजà¥à¤žà¤¾à¤¨à¤¿à¤• तरीके से अवगत कराना, ताकि अगर कोई किसान या फिर खेती के इचà¥à¤›à¥à¤• सामानà¥à¤¯ जन लाà¤à¤•ारी खेती करना चाहते हैं, तो वे खीरे की खेती कर सकते हैं। अगर आप सही समय पर बà¥à¤†à¤ˆ, उचित किसà¥à¤® का चयन, आवशà¥à¤¯à¤• सिंचाई के साथ-साथ रोग à¤à¤µà¤‚ कीटों से फसल की रकà¥à¤·à¤¾ करते हैं, तो आप खीरे की बेहतर उपज à¤à¤µà¤‚ इससे बेहतर पà¥à¤°à¥‰à¤«à¤¿à¤Ÿ कमा सकते हैं।