फसल चकà¥à¤° मिटà¥à¤Ÿà¥€ में पोषकता को बनाठरखने की à¤à¤• पà¥à¤°à¤•à¥à¤°à¤¿à¤¯à¤¾ है, जिसमें à¤à¤• ही à¤à¥‚मि पर दो या दो से अधिक फसलों को कà¥à¤°à¤®à¤¿à¤• रूप से बोया जाता है, जिससे मिटà¥à¤Ÿà¥€ में पोषक ततà¥à¤µ बने रहते हैं à¤à¤µà¤‚ साइल हेलà¥à¤¥ में सà¥à¤§à¤¾à¤° होता है। उलà¥à¤²à¥‡à¤–नीय है कि पौधे अपने विकास के लिठमिटà¥à¤Ÿà¥€ से पोषक ततà¥à¤µ पà¥à¤°à¤¾à¤ªà¥à¤¤ करते हैं। मिटà¥à¤Ÿà¥€ में फसल के विकास के लिठनाइटà¥à¤°à¥‹à¤œà¤¨, पोटेशियम, कैलà¥à¤¸à¤¿à¤¯à¤®, फासà¥à¤«à¥‹à¤°à¤¸, सलà¥à¤«à¤° जैसे जरà¥à¤°à¥€ पोषक ततà¥à¤µ पà¥à¤°à¤šà¥à¤° मातà¥à¤°à¤¾ में पाठजाते हैं, लेकिन इसकी मातà¥à¤°à¤¾ की à¤à¥€ सीमा है, उलà¥à¤²à¥‡à¤–नीय है कि à¤à¤• लमà¥à¤¬à¥€ पà¥à¤°à¤•à¥à¤°à¤¿à¤¯à¤¾ के दौरान इन सà¤à¥€ पोषक ततà¥à¤µà¥‹à¤‚ का निरà¥à¤®à¤¾à¤£ होता है। अगर किसी मिटà¥à¤Ÿà¥€ में à¤à¤• ही फसल की बार-बार बà¥à¤†à¤ˆ/रोपाई करते हैं, तो वह अमà¥à¤• फसल अपने विकास के लिठजरà¥à¤°à¥€ पोषक ततà¥à¤µà¥‹à¤‚ का दोहन कर उसे निमà¥à¤¨à¤¤à¤® सà¥à¤¤à¤° पर या शूनà¥à¤¯ सà¥à¤¤à¤° पर ला सकता है, जिससे फसल की पैदावार में कमी हो जाती है। साथ ही रोग, कीट à¤à¤µà¤‚ खरपतवारों की समसà¥à¤¯à¤¾ बढ़ जाती है। इन समसà¥à¤¯à¤¾à¤“ं से निपटने के लिठफसल चकà¥à¤° की आवशà¥à¤¯à¤•ता महसूस की गई, ताकि मिटà¥à¤Ÿà¥€ की उरà¥à¤µà¤°à¤¤à¤¾ बनी रहे à¤à¤µà¤‚ खेती टिकाऊ हो सके।
फसल चकà¥à¤° की अवधारणा कहाठसे आयी?
फसल चकà¥à¤° की अवधारणा हजारों वरà¥à¤·à¥‹à¤‚ पà¥à¤°à¤¾à¤¨à¥€ है। à¤à¤¸à¥‡ कई साकà¥à¤·à¥à¤¯ मिलते हैं, जिससे पता चलता है कि पà¥à¤°à¤¾à¤šà¥€à¤¨ रोमन काल में à¤à¥€ किसान फसल चकà¥à¤° की विधि अपनाते थे, जिसमें वें गेहूं के बाद फलियों की खेती किया करते थे। आधà¥à¤¨à¤¿à¤• रूप में यह पदà¥à¤§à¤¤à¤¿ यूरोप में 18 वीं सदी में वैजà¥à¤žà¤¾à¤¨à¤¿à¤• रूप से अपनाई गई जब चार-फसली पà¥à¤°à¤£à¤¾à¤²à¥€ (Four Crop System) की शà¥à¤°à¥à¤†à¤¤ हà¥à¤ˆ, जिसमें गेंहू, जौ, चारा à¤à¤µà¤‚ फलियाठबारी-बारी से बोई जाती थीं।
फसल चकà¥à¤° की थà¥à¤¯à¥‹à¤°à¥€ कà¥à¤¯à¤¾ है?
फसल चकà¥à¤° के नीचे दिठगये कà¥à¤› मूलà¤à¥‚त थà¥à¤¯à¥‹à¤°à¥€à¤œ हैं, जिसपर ही फसल चकà¥à¤° का पूरा कांसेपà¥à¤Ÿ आधारित है।
- जिन फसलों के विकास के लिठसिंचाई की अधिक मातà¥à¤°à¤¾ लगती है, उन फसलों को कम सिचाई वाले फसलों से पहले बोना है।
- जिन फसलों के विकास के लिठअधिक खाद की जरà¥à¤°à¤¤ पड़ती हैं, उनà¥à¤¹à¥‡à¤‚ पहले बोना है, à¤à¤µà¤‚ कम खाद की जरà¥à¤°à¤¤ वाले फसलों को बाद में बोना है।
- जिन फसलों के लिठअधिक निराई-गà¥à¥œà¤¾à¤ˆ की जरà¥à¤°à¤¤ पड़ती है उनà¥à¤¹à¥‡à¤‚ उन फसलों के पहले बोना है, जिनमें निराई गà¥à¥œà¤¾à¤ˆ की कम आवशà¥à¤¯à¤•ता पड़ती है।
- धानà¥à¤¯ फसलों के बाद दलहनी फसलों की रोपाई/बà¥à¤†à¤ˆ करनी है।
- वैसे फसल जो मिटà¥à¤Ÿà¥€ से अपने विकास के लिठअधिक मातà¥à¤°à¤¾ में पोषण ततà¥à¤µà¥‹à¤‚ का गà¥à¤°à¤¹à¤£ करते हैं, उन फसलों की कटाई के बाद खेत को परती अरà¥à¤¥à¤¾à¤¤ बिना कोई फसल उगाये वैसे ही छोड़ना है।
- à¤à¤• ही जीवों दà¥à¤µà¤¾à¤°à¤¾ नà¥à¤•सान पहà¥à¤šà¤¾à¤¨à¥‡ वाले फसलों को à¤à¤• के बाद à¤à¤• नहीं लगाना है।
- लोकल मारà¥à¤•ेट के डिमांड को देखते हà¥à¤ फसल को शामिल करना चाहिà¤à¥¤
- जलवायॠà¤à¤µà¤‚ किसानों की आरà¥à¤¥à¤¿à¤• कà¥à¤·à¤®à¤¤à¤¾ के अनà¥à¤¸à¤¾à¤° फसल का चà¥à¤¨à¤¾à¤µ करना चाहिà¤à¥¤
à¤à¤¾à¤°à¤¤à¥€à¤¯ परिपेकà¥à¤· में फसल चकà¥à¤° की पà¥à¤°à¤¾à¤¸à¤‚गिकता कितनी है?
à¤à¤¾à¤°à¤¤ में उषà¥à¤£à¤•टिबंधीय à¤à¤µà¤‚ उपोषà¥à¤£à¤•टिबंधीय जलवायॠहोती है, जिसमें पà¥à¤°à¤¤à¤¿ वरà¥à¤· दो या इससे अधिक फसलों को उगाया जाना संà¤à¤µ है। जिसके कारण यहाठमृदा के सà¥à¤µà¤¾à¤¸à¥à¤¥à¥à¤¯ को कायम रखने के लिठफसल चकà¥à¤°à¤£ की अवधारणा को कारà¥à¤¯à¤°à¥‚प में परिणत किया जाता रहा है। यह ना केवल किसानों के जोखिम को कम करता है, बलà¥à¤•ि बेहतर लाठà¤à¥€ सà¥à¤¨à¤¿à¤¶à¥à¤šà¤¿à¤¤ करता है।
फसल चकà¥à¤° के लिठफसल का सेलेकà¥à¤¶à¤¨ कैसे करें?
फसल चकà¥à¤° के लिठसही फसल चà¥à¤¨à¤¨à¤¾ मà¥à¤¶à¥à¤•िल हो सकता है। हमें कà¥à¤› बातों को जानना होगा जिनका पालन फसल चकà¥à¤° के लिठफसल चà¥à¤¨à¤¤à¥‡ समय किया जाना चाहिà¤à¥¤ आइठनीचे दिठगठमà¥à¤–à¥à¤¯ विचारों पर à¤à¤• नज़र डालें:
- मिटà¥à¤Ÿà¥€ संरचना में सà¥à¤§à¤¾à¤° के लिà¤- मृदा संरचना में सà¥à¤§à¤¾à¤° के लिठगहरी जड़ वाली फसलों को कम गहरी जड़ वाली फसलों के साथ ऑपà¥à¤¶à¤¨à¤² रूप में लगाना चाहिà¤à¥¤
- मिटà¥à¤Ÿà¥€ की उरà¥à¤µà¤°à¤¤à¤¾ बà¥à¤¾à¤¨à¥‡ के लिà¤- उचà¥à¤š नाइटà¥à¤°à¥‹à¤œà¤¨ की मांग वाली फसलों को मिटà¥à¤Ÿà¥€ की आवशà¥à¤¯à¤•ताओं को पूरा करने à¤à¤µà¤‚ इसे अधिक उपजाऊ बनाने के लिठसिसà¥à¤Ÿà¤® नाइटà¥à¤°à¥‹à¤œà¤¨-फिकà¥à¤¸à¤¿à¤‚ग फसलों के साथ ऑपà¥à¤¶à¤¨à¤² रूप से लगाना चाहिà¤à¥¤
- खरपतवार à¤à¤µà¤‚ कीट नियंतà¥à¤°à¤£ के लिà¤- धीमी गति से बढ़ने वाली फसलों को खरपतवार को दबाने वाली फसलों के बाद लगाना चाहिठकà¥à¤¯à¥‹à¤‚कि वे खरपतवार के आकà¥à¤°à¤®à¤£ के पà¥à¤°à¤¤à¤¿ अधिक संवेदनशील होती हैं।
फसल चकà¥à¤° में कà¥à¤·à¥‡à¤¤à¥à¤° के अनà¥à¤¸à¤¾à¤° पà¥à¤°à¤¯à¥‹à¤— की जाने वाली पà¥à¤°à¤®à¥à¤– फसलें
जलवायॠà¤à¤µà¤‚ मिटà¥à¤Ÿà¥€ के पà¥à¤°à¤•ार के अनà¥à¤¸à¤¾à¤° देश à¤à¤° में फसल चकà¥à¤° की पà¥à¤°à¤•à¥à¤°à¤¿à¤¯à¤¾ में विà¤à¤¿à¤¨à¥à¤¨ पà¥à¤°à¤•ार के फसलों को अपनाया जाता है।
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फसल चकà¥à¤°- पà¥à¤°à¤¯à¥‹à¤— की जाने वाली फसलें
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कà¥à¤·à¥‡à¤¤à¥à¤°
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चावल-दालें, जà¥à¤µà¤¾à¤°-दालें, बाजरा-दालें, सोयाबीन-सरसों, मूंगफली-गेहूं, मकà¥à¤•ा-दालें या तिपतिया घास
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पूरे देश à¤à¤° में
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चावल-तिलहन, चावल-दालें, मकà¥à¤•ा - दालें या तिलहन
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वरà¥à¤·à¤¾ आधारित कà¥à¤·à¥‡à¤¤à¥à¤°
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चावल-गेहूं, चावल-मकà¥à¤•ा, मकà¥à¤•ा-गेहूं
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सिंचित कà¥à¤·à¥‡à¤¤à¥à¤°
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चावल-सरसों
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पूरà¥à¤µà¥€ उतà¥à¤¤à¤° पà¥à¤°à¤¦à¥‡à¤¶, बिहार à¤à¤µà¤‚ उतà¥à¤¤à¤°à¥€ पशà¥à¤šà¤¿à¤® बंगाल
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चावल-सबà¥à¤œà¥€, गनà¥à¤¨à¤¾-गेहूं, गेहूं-सबà¥à¤œà¥€, गेहूं-दाल, गेहूं-परती, जà¥à¤µà¤¾à¤°-बरसीम, मकà¥à¤•ा-सरसों, सरसों-सबà¥à¤œà¥€, मकà¥à¤•ा-गेहूं
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सिंधà¥-गंगा के मैदान
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चावल- हरा चना/काला चना
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पूरà¥à¤µà¥€ à¤à¤¾à¤°à¤¤ (ओडिशा, पशà¥à¤šà¤¿à¤® बंगाल)
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à¤à¤¾à¤°à¤¤ में फसल चकà¥à¤° सबसे अधिक किन राजà¥à¤¯à¥‹à¤‚ में अपनाई जाती है?
à¤à¤¾à¤°à¤¤ में फसल चकà¥à¤° को सबसे अधिक निमà¥à¤¨ बताये गठराजà¥à¤¯à¥‹à¤‚ में अपनाया जाता है:
- मधà¥à¤¯ पà¥à¤°à¤¦à¥‡à¤¶ (सोयाबीन–गेंहू)
- बिहार (धान–गेहूं–दलहन)
- à¤à¤¾à¤°à¤–णà¥à¤¡ (धान–गेहूं–दलहन)
- करà¥à¤¨à¤¾à¤Ÿà¤• (मकà¥à¤•ा–तà¥à¤…र–सूरजमà¥à¤–ी)
- महाराषà¥à¤Ÿà¥à¤° (कपास–चना–जà¥à¤µà¤¾à¤°)
- उतà¥à¤¤à¤° पà¥à¤°à¤¦à¥‡à¤¶ (धान–गेंहू–सबà¥à¤œà¤¿à¤¯à¤¾à¤)
फसल चकà¥à¤° अपनाठजाने के कà¥à¤¯à¤¾ लाठहैं?
फसल चकà¥à¤° अपनाठजाने से पोषक ततà¥à¤µà¥‹à¤‚ की मातà¥à¤°à¤¾ मृदा में हमेशा बनी रहती है। आइये जानते हैं इससे कà¥à¤¯à¤¾-कà¥à¤¯à¤¾ लाठहै:
- रोग à¤à¤µà¤‚ कीटों पर नियंतà¥à¤°à¤£ होता है।
- बदल-बदल कर फसल उगाने से उतà¥à¤ªà¤¾à¤¦à¤¨ बà¥à¤¤à¤¾ है।
- परà¥à¤¯à¤¾à¤µà¤°à¤£ संरकà¥à¤·à¤£ में मदद मिलती है।
- कारà¥à¤¬à¤¨-नाइटà¥à¤°à¥‹à¤œà¤¨ के अनà¥à¤ªà¤¾à¤¤ में वृदà¥à¤§à¤¿ होती है, जिससे मिटà¥à¤Ÿà¥€ की उरà¥à¤µà¤°à¤¤à¤¾ में बà¥à¥‹à¤¤à¤°à¥€ होती है।
- मिटà¥à¤Ÿà¥€ का पीà¤à¤š à¤à¤µà¤‚ कà¥à¤·à¤¾à¤°à¥€à¤¯ सà¥à¤¤à¤° फसल के अनà¥à¤•ूल बना रहता है।
- मृदा के बहाव, कà¥à¤·à¤°à¤£ से बचाव होता है।
- फसलों में रोगों का पà¥à¤°à¤•ोप कम होता है।
- फसल को नà¥à¤•सान पहà¥à¤à¤šà¤¾à¤¨à¥‡ वाले कीटों का नियंतà¥à¤°à¤£ होता है।
- खरपतवार का नियंतà¥à¤°à¤£ होता है।
- आय की पà¥à¤°à¤¾à¤ªà¥à¤¤à¤¿ पूरे वरà¥à¤· होती है।
- à¤à¥‚मि में फसल को हानि पहà¥à¤à¤šà¤¾à¤¨à¥‡ वाले पदारà¥à¤¥ à¤à¤•तà¥à¤°à¤¿à¤¤ नहीं होते हैं।
- फफूंद से फसल को होने वाले नà¥à¤•सान से बचाव होता है।
फसल चकà¥à¤° अपनाठजाने में चà¥à¤¨à¥Œà¤¤à¤¿à¤¯à¤¾à¤‚ कà¥à¤¯à¤¾-कà¥à¤¯à¤¾ हैं?
हालाà¤à¤•ि फसल चकà¥à¤° हमारे लिठबहà¥à¤¤ ही लाà¤à¤•ारी हैं, परंतॠइससे आपनाठजाने में कà¥à¤› चà¥à¤¨à¥Œà¤¤à¤¿à¤¯à¤¾à¤ à¤à¥€ हैं:
- योजना बनाने में कठिनाई।
- फसल की जानकारी à¤à¤µà¤‚ तकनीकी जà¥à¤žà¤¾à¤¨ की आवशà¥à¤¯à¤•ता।
- बाजार में सà¤à¥€ फसलों के लिठमांग à¤à¤µà¤‚ मूलà¥à¤¯ का असंतà¥à¤²à¤¨à¥¤
टà¥à¤°à¥ˆà¤•à¥à¤Ÿà¤°à¤•ारवां की ओर से
फसल चकà¥à¤° à¤à¤• à¤à¤¸à¥€ तकनीक है, जो न केवल कृषि को सà¥à¤¥à¤¾à¤¯à¥€ à¤à¤µà¤‚ बेहतर फलदायी बनाती है बलà¥à¤•ि परà¥à¤¯à¤¾à¤µà¤°à¤£ के लिठà¤à¥€ लाà¤à¤¦à¤¾à¤¯à¤• है। आज के समय में जलवायॠपरिवरà¥à¤¤à¤¨ à¤à¤µà¤‚ पà¥à¤°à¤¾à¤•ृतिक संसाधनों की सीमितता को देखते हà¥à¤ फसल चकà¥à¤° को अपनाना समय की मांग है। हमनें इस आरà¥à¤Ÿà¤¿à¤•ल में फसल चकà¥à¤° से जà¥à¥œà¥€ सà¤à¥€ जानकारी देने का पà¥à¤°à¤¯à¤¾à¤¸ किया है। हमारा उदà¥à¤¦à¥‡à¤¶à¥à¤¯ है इस आरà¥à¤Ÿà¤¿à¤•ल को पà¥à¤•र किसान फसल चकà¥à¤° की जरà¥à¤°à¤¤ à¤à¤µà¤‚ महतà¥à¤¤à¥à¤µ को समà¤à¤¤à¥‡ हà¥à¤ इसे अपनाà¤à¤, ताकि मिटà¥à¤Ÿà¥€ की उरà¥à¤µà¤°à¤¤à¤¾ शकà¥à¤¤à¤¿ बनी रहने के साथ-साथ फसल की पैदावार में वृदà¥à¤§à¤¿ हो सके।