खरबूजे की खेती: खरबूजे की खेती गरà¥à¤®à¥€ के मौसम में की जाती है। सà¥à¤µà¤¾à¤¸à¥à¤¥à¥à¤¯ की दृषà¥à¤Ÿà¤¿ से मूतà¥à¤°à¤¾à¤¶à¤¯ संबंधी रोगों के लिठखरबूजे का सेवन बहà¥à¤¤ ही उपयोगी माना जाता है। पानी की मातà¥à¤°à¤¾ अधिक होने के कारण गरà¥à¤®à¥€ के मौसम में इसका सेवन शरीर को हाइडà¥à¤°à¥‡à¤Ÿ रखने के लिठकिया जाता है। इसके साथ ही खरबूजे के बीजों का पà¥à¤°à¤¯à¥‹à¤— मिठाई को संजाने, उनà¥à¤¹à¥‡à¤‚ आकरà¥à¤·à¤• लà¥à¤• देने के लिठकिया जाता है। इस पà¥à¤°à¤•ार खरबूजे के फलों के साथ, इसके बीजों की मांग à¤à¥€ बनी रहती है, जो इसकी खेती को आरà¥à¤¥à¤¿à¤• दृषà¥à¤Ÿà¤¿ से लाà¤à¤•ारी बनाता है। इसकी खेती अधिकांशतः (लगà¤à¤— 80%) नदियों के किनारे की जाती है। खरबूजे की पà¥à¤°à¤®à¥à¤– रूप से खेती किये जाने वाले राजà¥à¤¯à¥‹à¤‚ में उतà¥à¤¤à¤° पà¥à¤°à¤¦à¥‡à¤¶, बिहार, राजसà¥à¤¥à¤¾à¤¨, महाराषà¥à¤Ÿà¥à¤°, à¤à¤µà¤‚ मधà¥à¤¯ पà¥à¤°à¤¦à¥‡à¤¶ के नाम शामिल हैं। हमारा देश à¤à¥Œà¤—ोलिक रूप से विविधताओं से à¤à¤°à¤¾ देश है, जिससे यहाठकà¥à¤·à¥‡à¤¤à¥à¤°à¤¾à¤¨à¥à¤¸à¤¾à¤° जलवायॠमें à¤à¤¿à¤¨à¥à¤¨à¤¤à¤¾ देखी जाती है। अगर अपने कà¥à¤·à¥‡à¤¤à¥à¤° की मिटà¥à¤Ÿà¥€ à¤à¤µà¤‚ जलवायॠकी कà¥à¤·à¤®à¤¤à¤¾ का उचित आकलन कर खेती की जाà¤, तो यह विविधता हमारे लिठवरदान साबित हो सकती है। दूसरे शबà¥à¤¦à¥‹à¤‚ में कहें तो अगर कृषि में वैजà¥à¤žà¤¾à¤¨à¤¿à¤•ता को महतà
खरबूजे की खेती के लिठगरà¥à¤® à¤à¤µà¤‚ शà¥à¤·à¥à¤• जलवायॠसबसे उपयà¥à¤•à¥à¤¤ होती है। इसकी खेती वैसे à¤à¥‚मि में की जानी चाहिà¤, जहाठजल की उपयà¥à¤•à¥à¤¤ निकासी हो। जहाठतक मिटà¥à¤Ÿà¥€ की बात है, तो बलà¥à¤ˆ या दोमट मिटà¥à¤Ÿà¥€, जिसमें जीवांश की मातà¥à¤°à¤¾ अधिक हो, बेहद ही उपयà¥à¤•à¥à¤¤ मानी जाती है। बीजों के अंकà¥à¤°à¤£ à¤à¤µà¤‚ पौधे के विकास के लिठ22 से 26 डिगà¥à¤°à¥€ के बीच का तापकà¥à¤°à¤® उपयà¥à¤•à¥à¤¤ होता है।
खरबूजे की खेती के लिठसबसे पहले उपयà¥à¤•à¥à¤¤ मिटà¥à¤Ÿà¥€ वाली à¤à¥‚मि का चà¥à¤¨à¤¾à¤µ करना बेहद ही जरà¥à¤°à¥€ है। इसके लिठबलà¥à¤ˆ दोमट मिटà¥à¤Ÿà¥€ जिसमें जीवांश की उचित मातà¥à¤°à¤¾ हो, तथा जिसका पीà¤à¤š मान 6 से 7 हो à¤à¤µà¤‚ जिसकी जल-शोषण की कà¥à¤·à¤®à¤¤à¤¾ अधिक हो, खरबूजे के लिठउपयà¥à¤•à¥à¤¤ मिटà¥à¤Ÿà¥€ होती है। पथरीली à¤à¥‚मि या जहाठपानी का जमाव हो, वैसे à¤à¥‚मि खरबूजे के विकास के लिठउपयà¥à¤•à¥à¤¤ नहीं मानी जाती है। मिटà¥à¤Ÿà¥€ के चà¥à¤¨à¤¾à¤µ के बाद सबसे पà¥à¤°à¤¾à¤¥à¤®à¤¿à¤• à¤à¤µà¤‚ अहमॠकारà¥à¤¯ होता है, खेत की तैयारी यानी मिटà¥à¤Ÿà¥€ की तैयारी। बता दें कि खरबूजे की खेती के लिठमिटà¥à¤Ÿà¥€ की तैयारी विशेष नहीं, बलà¥à¤•ि सामानà¥à¤¯ रूप से ही करने की जरà¥à¤°à¤¤ है। इसके लिठआपको पहली जà¥à¤¤à¤¾à¤ˆ में मिटà¥à¤Ÿà¥€ को पलटने का कारà¥à¤¯ करना है, जिसके बाद 2 से 3 जà¥à¤¤à¤¾à¤ˆ पà¥à¤²à¤¾à¤Š या कलà¥à¤Ÿà¥€à¤µà¥‡à¤Ÿà¤° से करनी है। धà¥à¤¯à¤¾à¤¨ रहे कि आपको पà¥à¤°à¤¤à¥à¤¯à¥‡à¤• जà¥à¤¤à¤¾à¤ˆ के बाद खेत में पाटा चलाना है, जो आपके खेत की मिटà¥à¤Ÿà¥€ को à¤à¥‚रà¤à¥‚रा à¤à¤µà¤‚ समतल बनाà¤à¤—ा, जिससे सिंचाई के दौरान पानी का उचित à¤à¤µà¤‚ समान वितरण संà¤à¤µ हो पाà¤à¤—ा।
किसी à¤à¥€ फसल की उनà¥à¤¨à¤¤ à¤à¤µà¤‚ बेहतर पैदावार के लिठउपयà¥à¤•à¥à¤¤ जलवायॠà¤à¤µà¤‚ मिटà¥à¤Ÿà¥€ के साथ-साथ उनà¥à¤¨à¤¤ किसà¥à¤® का चà¥à¤¨à¤¾à¤µ करना बहà¥à¤¤ ही महतà¥à¤µà¤ªà¥‚रà¥à¤£ होता है। मारà¥à¤•ेट में खरबूजे की बहà¥à¤¤ सारी किसà¥à¤®à¥‡à¤‚ उपलबà¥à¤§ हैं, जिनमें कà¥à¤› पà¥à¤°à¤®à¥à¤– निमà¥à¤¨ है-
काशी मधà¥:- इस किसà¥à¤® के फल का वजन लगà¤à¤— 800 गà¥à¤°à¤¾à¤® के आस-पास होता है, जिसके गà¥à¤¦à¥‡ का रंग गहरा नारंगी होता है। यह फफूंद से होने वाले रोग का पà¥à¤°à¤¤à¤¿à¤°à¥‹à¤§à¥€ होता है, जिसकी औसत पैदावार 200 से 250 कà¥à¤‚तल पà¥à¤°à¤¤à¤¿ हेकà¥à¤Ÿà¥‡à¤¯à¤° होती है।
अरà¥à¤•ा अजीत:- इसका फल होता होता है, जिसका औसत वजन 350 गà¥à¤°à¤¾à¤® होता है। इसके फल का रंग सà¥à¤¨à¤¹à¤°à¤¾ नारगी होता है, जिसकी पैदावार 140 से 150 कà¥à¤‚तल पà¥à¤°à¤¤à¤¿ हेकà¥à¤Ÿà¥‡à¤¯à¤° होती है।
हरा मधà¥:- इस किसà¥à¤® के खरबूजे आकार में बड़े होते हैं, जिसका औसत वजन लगà¤à¤— 1 किलोगà¥à¤°à¤¾à¤® होता है। पकने पर ये पीले रंग के हो जाते हैं, जिसपर हरे रंग की धारियां बनी होती है। इस किसà¥à¤® की फसल की औसत उपज 150 कà¥à¤‚तल पà¥à¤°à¤¤à¤¿ हेकà¥à¤Ÿà¥‡à¤¯à¤° होती है।
पंजाब सà¥à¤¨à¤¹à¤°à¥€:- इसके फलों का औसत वजन 1 किलोगà¥à¤°à¤¾à¤® होता है। इसकी औसत उपज 175 से 200 कà¥à¤‚तल पà¥à¤°à¤¤à¤¿ हेकà¥à¤Ÿà¥‡à¤¯à¤° होती है।
पंजाब संकर-1:- इस फल के गà¥à¤¦à¤¾ काफी सà¥à¤—नà¥à¤§à¤¿à¤¤ होते हैं, जिसका औसत उपज 160 कà¥à¤‚तल पà¥à¤°à¤¤à¤¿ हेकà¥à¤Ÿà¥‡à¤¯à¤° होती है।
पौधे के उचित विकास के लिठपोषक ततà¥à¤µà¥‹à¤‚ का होना बहà¥à¤¤ ही आवशà¥à¤¯à¤• है, कà¥à¤¯à¥‹à¤‚कि इसके बिना उचित विकास à¤à¤µà¤‚ फलों का उचित पैदावार संà¤à¤µ नहीं है। पौधे के विकास के लिठआवशà¥à¤¯à¤• खनिज à¤à¤µà¤‚ पोषक ततà¥à¤µ पà¥à¤°à¤¤à¥à¤¯à¥‡à¤• मिटà¥à¤Ÿà¥€ में उपसà¥à¤¥à¤¿à¤¤ नहीं होते हैं, जिसकी पूरà¥à¤¤à¤¿ के लिठहम खेतों में उचित मातà¥à¤°à¤¾ में खाद à¤à¤µà¤‚ उरà¥à¤µà¤°à¤• का पà¥à¤°à¤¯à¥‹à¤— करते हैं। अगर संà¤à¤µ हो तो बीज की बà¥à¤†à¤ˆ के पूरà¥à¤µ मिटà¥à¤Ÿà¥€ का परिकà¥à¤·à¤£ (Soil Testing) अवशà¥à¤¯ करा लेनी चाहिà¤, जिससे और à¤à¥€ सà¥à¤ªà¤·à¥à¤Ÿà¤¤à¤¾ से हम मिटà¥à¤Ÿà¥€ की गà¥à¤£à¤µà¤¤à¥à¤¤à¤¾ का आकलन कर सकते हैं। आमतौर पर खरबूजे की खेती के लिठपà¥à¤°à¤¤à¤¿ हेकà¥à¤Ÿà¥‡à¤¯à¤° में 90 किलोगà¥à¤°à¤¾à¤® नाइटà¥à¤°à¥‹à¤œà¤¨, 70 किलोगà¥à¤°à¤¾à¤® फासà¥à¤«à¥‹à¤°à¤¸, à¤à¤µà¤‚ 60 किलोगà¥à¤°à¤¾à¤® पोटाश के पà¥à¤°à¤¯à¥‹à¤— की आवशà¥à¤¯à¤•ता होती है। जिसमें से नाइटà¥à¤°à¥‹à¤œà¤¨ की आधी मातà¥à¤°à¤¾ à¤à¤µà¤‚ फासà¥à¤«à¥‹à¤°à¤¸ à¤à¤µà¤‚ पोटाश की पूरी मातà¥à¤°à¤¾ का छिडकाव खेत में बीज बà¥à¤†à¤ˆ के लिठनालियाठà¤à¤µà¤‚ थाले बनाते समय ही कर देनी चाहिà¤à¥¤ बचे हà¥à¤ आधी नाइटà¥à¤°à¥‹à¤œà¤¨ की मातà¥à¤°à¤¾ को बà¥à¤†à¤ˆ से 20 से 45 दिनों के बाद खड़ी फसल में जड़ों के पास देनी चाहिà¤à¥¤ इसके साथ ही फलों की संखà¥à¤¯à¤¾ à¤à¤µà¤‚ कà¥à¤² उपज में वृदà¥à¤§à¤¿ के लिठआप बोरोन, कैलà¥à¤¸à¤¿à¤¯à¤®, मालीबà¥à¤¡à¥‡à¤¨à¤® का 3 मिली गà¥à¤°à¤¾à¤® पà¥à¤°à¤¤à¤¿ लीटर की दर से छिड़काव करना चाहिà¤à¥¤
कà¥à¤·à¥‡à¤¤à¥à¤° à¤à¤µà¤‚ जलवायॠके अनà¥à¤¸à¤¾à¤° खरबूजे की बà¥à¤†à¤ˆ के समय में à¤à¤¿à¤¨à¥à¤¨à¤¤à¤¾ होती है। जहाठमैदानी कà¥à¤·à¥‡à¤¤à¥à¤°à¥‹à¤‚ में खरबूजे की बà¥à¤†à¤ˆ 10 से 20 फरवरी के बीच की जाती है, वहीठपहाड़ी कà¥à¤·à¥‡à¤¤à¥à¤°à¥‹à¤‚ में इसकी बà¥à¤†à¤ˆ का उपयà¥à¤•à¥à¤¤ समय अपà¥à¤°à¥ˆà¤² से मई की होती है। नदियों के ककà¥à¤·à¤¾à¤° वाली कà¥à¤·à¥‡à¤¤à¥à¤°à¥‹à¤‚ में इसकी बà¥à¤†à¤ˆ नवमà¥à¤¬à¤° या जनवरी के अंतिम सपà¥à¤¤à¤¾à¤¹ में की जाती है। दूसरी तरह मधà¥à¤¯ à¤à¤µà¤‚ दकà¥à¤·à¤¿à¤£ à¤à¤¾à¤°à¤¤ में खरबूजे की बà¥à¤†à¤ˆ का सही समय अकà¥à¤Ÿà¥‚बर-नवमà¥à¤¬à¤° होती है।
1 हेकà¥à¤Ÿà¥‡à¤¯à¤° कà¥à¤·à¥‡à¤¤à¥à¤° में खरबूजे की खेती के लिठ3 से 4 किलोगà¥à¤°à¤¾à¤® बीज की आवशà¥à¤¯à¤•ता होती है।
à¤à¥Œà¤—ोलिक परिसà¥à¤¥à¤¿à¤¤à¤¿à¤¯à¥‹à¤‚ à¤à¤µà¤‚ जलवायॠके अनà¥à¤¸à¤¾à¤° खरबूजे की बीज की बà¥à¤†à¤ˆ के अलग-अलग तरीके पà¥à¤°à¤¯à¥‹à¤— में लाये जाते हैं। मैदानी कà¥à¤·à¥‡à¤¤à¥à¤°à¥‹à¤‚ में खरबूजे की बà¥à¤†à¤ˆ के लिठ30 से 40 सेमी चौड़ी नालियां (मेà¥à¥‡) बनायी जाती है, जिसकी आपस में दूरी 1.5 से 2 मीटर की रखी जाती है। बीज की बà¥à¤†à¤ˆ मेà¥à¥‹à¤‚ पर 50 से 60 सेमी की दूरी पर की जाती है। बीज की गहराई 1.5 से 2 सेमी की रखी जाती है। वही नदियों के किनारे गडà¥à¤¢à¥‡ बनाकर बीज की बà¥à¤†à¤ˆ की जाती है। इसके लिठसबसे पहले 60 x 60 x 60 सेमी आकार का गडà¥à¤¢à¤¾ बनाकर 1:1:1 के अनà¥à¤ªà¤¾à¤¤ में गोबर की खाद मिटà¥à¤Ÿà¥€ तथा बालू में मिलाकर बीज की बà¥à¤†à¤ˆ की जाती है।
खरबूजा पà¥à¤°à¤®à¥à¤– रूप से गà¥à¤°à¥€à¤·à¥à¤® ऋतॠका फसल है, जिस समय गरà¥à¤®à¥€ अपने चरम पर रहती है, à¤à¤¸à¥‡ में इसमें सिंचाई की अधिक जरà¥à¤°à¤¤ पड़ती है। इस पà¥à¤°à¤•ार गà¥à¤°à¥€à¤·à¥à¤® काल में उगाई जा रही फसलों में 4 से 7 दिन के अनà¥à¤¤à¤°à¤¾à¤² पर सिंचाई करते रहनी चाहिà¤à¥¤ वहीं नदियों के ककà¥à¤·à¤¾à¤°à¥‹à¤‚ में बोई जाने वाली फसलों में 1 से 2 बार सिंचाई करने की जरà¥à¤°à¤¤ होती है।
चूà¤à¤•ि गà¥à¤°à¥€à¤·à¥à¤® ऋतॠà¤à¤• वरà¥à¤·à¤¾ वाला मौसम à¤à¥€ होता है, इसलिठइस काल का फसल होने की वजह से खरबूजे की फसल के दौरान खरपतवार की समसà¥à¤¯à¤¾ à¤à¥€ बनी रहती है। इसलिठसमय-समय पर खरपतवार को खेतों से निकालने का कारà¥à¤¯ किया जाना चाहिà¤, वरना ये फसल के विकास में बाधक हो सकते हैं। इसके लिठमैनà¥à¤…ल के साथ-साथ आप रासायनिक खरपतवारनाशी बूटाकà¥à¤²à¥‹à¤° का 2 किलोगà¥à¤°à¤¾à¤® पà¥à¤°à¤¤à¤¿ हेकà¥à¤Ÿà¥‡à¤¯à¤° की दर से छिड़काव बीज बà¥à¤†à¤ˆ के तà¥à¤°à¤‚त बाद से करते रहनी चाहिà¤à¥¤
खरबूजे की बà¥à¤†à¤ˆ से लेकर फसल की तà¥à¥œà¤¾à¤ˆ तक हमें खरबूजे की खेतों को कीटों के आकà¥à¤°à¤®à¤£ से सà¥à¤°à¤•à¥à¤·à¤¿à¤¤ रखने की जरà¥à¤°à¤¤ होती है। वरना ये आकार में छोटे लेकिन संखà¥à¤¯à¤¾ में अधिक होने वाली कीटें आपके पूरे फसल को नà¥à¤•सान पहà¥à¤‚चा सकता है। तो आइये जानते हैं कौन से वो कीटें हैं, जिससे खरबूजे की फसल को बचाना आवशà¥à¤¯à¤• है:-
कदà¥à¤¦à¥‚ का लाल कीट (रेड पमà¥à¤ªà¤•ीन बिटिल):- ये कीटें विकà¥à¤¸à¤¿à¤¤ पौधे की छोटी पतà¥à¤¤à¤¿à¤¯à¥‹à¤‚ को नà¥à¤•सान पहà¥à¤‚चाते हैं। इसके साथ ही इनके गà¥à¤°à¤¬ (इलà¥à¤²à¥€) जमीन के अनà¥à¤¦à¤° होते हैं, जो पौधे की जड़ों पर आकà¥à¤°à¤®à¤£ कर जड़ों को नà¥à¤•सान पहà¥à¤‚चाते हैं। इनके सकà¥à¤°à¥€à¤¯ होने का महिना जनवरी से मारà¥à¤š होता है, लेकिन इनका खतरा कमोबेश अकà¥à¤Ÿà¥‚बर तक बना रहता है।
इसके नियंतà¥à¤°à¤£ का सबसे सरल à¤à¤µà¤‚ पà¥à¤°à¤šà¤²à¤¿à¤¤ पà¥à¤°à¤¾à¤•ृतिक तरीका है, सà¥à¤¬à¤¹ ओस पड़ने के समय पतà¥à¤¤à¤¿à¤¯à¥‹à¤‚ पर राख का छिडकाव करना। इससे यह कीट पौधे पर नहीं बैठता है। वहीं इसके नियंतà¥à¤°à¤£ के लिठजैविक विधि के अंतरà¥à¤—त अजादीरैकà¥à¤Ÿà¤¿à¤¨ 300 पीपीà¤à¤® 5 से 10 मिली पà¥à¤°à¤¤à¤¿ लीटर या अजादीरैकà¥à¤Ÿà¤¿à¤¨ 5 पà¥à¤°à¤¤à¤¿à¤¶à¤¤ .5 मिली /लीटर की दर से 2 या 3 बार छिडकाव करने से कीटों पर नियंतà¥à¤°à¤£ पाया जा सकता है। अगर कीटों का बहà¥à¤¤ अधिक पà¥à¤°à¤•ोप हो गया हो, तो आप इसके नियंतà¥à¤°à¤£ के लिठरासायनिक कीटनाशी डाईकà¥à¤²à¥‹à¤°à¥‹à¤µà¤¾à¤¸ 76 ईसी या टà¥à¤°à¤¾à¤ˆà¤•à¥à¤²à¥‹à¤«à¥‡à¤°à¤¾à¤¨ का à¤à¥€ उचित मातà¥à¤°à¤¾ में छिडकाव कर सकते हैं।
फल मकà¥à¤–ी:- इसकी सूंडी बहà¥à¤¤ ही हानिकारक होती है। कीट की पà¥à¤°à¥Œà¥ मादा छोटे, मà¥à¤²à¤¾à¤¯à¤® फलों के छिलके को बेधकर अनà¥à¤¦à¤° अंडा देना पसंद करती है। अंडे से सूंडी निकलकर फलों के अनà¥à¤¦à¤° के à¤à¤¾à¤— को खाकर नà¥à¤•सान पहà¥à¤‚चाती है। कीट फल के जिस हिसà¥à¤¸à¥‡ पर अंडे देती है, वह हिसà¥à¤¸à¤¾ वहां से टेà¥à¤¾ होकर सड़ जाता है à¤à¤µà¤‚ नीचे गिर जाता है।
इसके नियंतà¥à¤°à¤£ के लिठगरà¥à¤®à¥€ के मौसम में खेत की गहरी जà¥à¤¤à¤¾à¤ˆ करनी चाहिà¤, जिससे मिटà¥à¤Ÿà¥€ की निचली सतह रहने वाली फलमकà¥à¤–ी का पà¥à¤¯à¥‚पा धूप लगने से नषà¥à¤Ÿ हो जाà¤à¤—ा। दूसरा उपाय है, इससे गà¥à¤°à¤¸à¤¿à¤¤ फल को इकठà¥à¤ ा करके नषà¥à¤Ÿ कर दें। इसके साथ ही इसके लिठआप रासायनिक कीटनाशक जैसे कà¥à¤²à¥‹à¤°à¥‡à¤‚टà¥à¤°à¤¾à¤¨à¥€à¤²à¥€à¤ªà¥à¤°à¥‹à¤² 18.5 à¤à¤¸à¤¸à¥€. 0.25 मिली पà¥à¤°à¤¤à¤¿ लीटर या डाईकà¥à¤²à¥‹à¤°à¥‹à¤µà¤¾à¤¸ 76 ईसी 1.25 मिली पà¥à¤°à¤¤à¤¿ लीटर की दर से छिड़काव कर सकते हैं।
चूरà¥à¤£à¥€ फफूà¤à¤¦ (चूरà¥à¤£à¤¿à¤² आसिता):- इस रोग से गà¥à¤°à¤¸à¤¿à¤¤ होने के बाद पौधे की पतà¥à¤¤à¤¿à¤¯à¤¾à¤‚ à¤à¤µà¤‚ तनों की सतह पर सफ़ेद या धà¥à¤‚धले धूसर धबà¥à¤¬à¥‡ उà¤à¤°à¤¨à¥‡ लगते हैं। कà¥à¤› दिनों के बाद ये धबà¥à¤¬à¥‡ चूरà¥à¤£-यà¥à¤•à¥à¤¤ हो जाते हैं à¤à¤µà¤‚ सफ़ेद चूरà¥à¤£ पूरे पौधे की सतह को ढक देता है, जिससे पौधे के पतà¥à¤¤à¥‡ गिर जाते हैं à¤à¤µà¤‚ फलों का कार छोटा रह जाता है।
इस रोग के उपचार का पà¥à¤°à¤¾à¤¥à¤®à¤¿à¤• à¤à¤µà¤‚ पà¥à¤°à¤¾à¤•ृतिक तरीका है- सरà¥à¤µà¤ªà¥à¤°à¤¥à¤® इस रोग से गà¥à¤°à¤¸à¤¿à¤¤ पौधों को इकठà¥à¤ ा कर लें à¤à¤µà¤‚ जला दें। दूसरा बà¥à¤†à¤ˆ के समय ही इस रोग के पà¥à¤°à¤¤à¤¿à¤°à¥‹à¤§à¥€ बीजों का चà¥à¤¨à¤¾à¤µ करें। आप इस रोग से बचाव के लिठफफूà¤à¤¦à¤¨à¤¾à¤¶à¤•ों जैसे कि टà¥à¤°à¤¾à¤‡à¤¡à¥€à¤®à¥‹à¤°à¥à¤« ½ मिली लीटर या माइकà¥à¤²à¥‹à¤¬à¥à¤²à¥‚टानिल का 1 गà¥à¤°à¤¾à¤® पà¥à¤°à¤¤à¤¿ 10 लीटर पानी के साथ घोल बनाकर 7 दिनों के अनà¥à¤¤à¤°à¤¾à¤² पर छिड़काव कर सकते हैं।
मृदà¥à¤°à¥‹à¤®à¤¿à¤² आसिता:- इस रोग की पहचान है पतà¥à¤¤à¤¿à¤¯à¥‹à¤‚ के उपरी सिरे पर कोणिय धबà¥à¤¬à¥‡ का बनना। यह तब फैलता है, जब वरà¥à¤·à¤¾à¤‹à¤¤à¥ के दौरान तापमान- 20 से 22 डिगà¥à¤°à¥€ हो जाता है।
इस रोग से पौधे का बचाव हो, इसके लिठआपको à¤à¤ªà¥à¤°à¥‹à¤¨ नामक कवकनाशी से शà¥à¤°à¥à¤†à¤¤ में ही बीज का उपचार कर लेना चाहिà¤à¥¤ या रोग के दिखने पर पà¥à¤°à¤¾à¤°à¤‚ठमें ही मैंकोजेव 0.25 पà¥à¤°à¤¤à¤¿à¤¶à¤¤ (2.5 गà¥à¤°à¤¾à¤® पà¥à¤°à¤¤à¤¿ लीटर) का छिडकाव करना चाहिà¤à¥¤
खीरा मोजैक वायरस:- इस रोग के संकà¥à¤°à¤®à¤£ होने से नई पतà¥à¤¤à¤¿à¤¯à¥‹à¤‚ पर छोटे à¤à¤µà¤‚ हलà¥à¤•े पीले रंग के धबà¥à¤¬à¥‡ बनने लगते हैं, जिसके बाद पतà¥à¤¤à¤¿à¤¯à¤¾à¤‚ सिकà¥à¥œà¤¨à¥‡ लगती है। इसके लकà¥à¤·à¤£ धीरे-धीरे फलों पर à¤à¥€ दिखने लगते हैं, जिसके बाद फलों का विकास अवरà¥à¤¦à¥à¤§ हो जाता है।
इसकी रोकथाम के लिठआप डाईमेथोà¤à¤Ÿ (0.05 पà¥à¤°à¤¤à¤¿à¤¶à¤¤) रासायनिक दवा का छिड़काव 10 दिनों के अंतराल पर करना चाहिà¤à¥¤
पूरà¥à¤£à¤°à¥‚प से परिपकà¥à¤µ यानी पक जाने के बाद ही खरबूजे की फलों की तà¥à¥œà¤¾à¤ˆ की जानी चाहिà¤à¥¤ पके फलों की पहचान निमà¥à¤¨ आधार पर कर सकते हैं-
धà¥à¤¯à¤¾à¤¨ रहे उपरà¥à¤¯à¥à¤•à¥à¤¤ संकेतों के आधार पर फल की तà¥à¥œà¤¾à¤ˆ दिन में गरà¥à¤®à¥€ बà¥à¤¨à¥‡ के पूरà¥à¤µ ही करनी चाहिà¤à¥¤ तà¥à¥œà¤¾à¤ˆ के बाद फलों के ठंढे सà¥à¤¥à¤¾à¤¨ पर सà¥à¤Ÿà¥‹à¤° करना चाहिà¤à¥¤
इस आरà¥à¤Ÿà¤¿à¤•ल में हमनें खरबूजे की खेती के विà¤à¤¿à¤¨à¥à¤¨ चरणों की सà¤à¥€ जानकारी को शामिल करने का पà¥à¤°à¤¯à¤¾à¤¸ किया है, ताकि वैसे किसान जो खरबूजे की खेती करना चाहते à¤à¤µà¤‚ उनके कà¥à¤·à¥‡à¤¤à¥à¤° की जलवायॠइस फसल के अनà¥à¤•ूल है तो वे à¤à¥€ खरबूज की खेती वैजà¥à¤žà¤¾à¤¨à¤¿à¤• तरीके से कर सकें। हमारा उदेशà¥à¤¯ किसानों को आरà¥à¤¥à¤¿à¤• रूप से सबल देखना है, और à¤à¤¸à¤¾ तà¤à¥€ संà¤à¤µ है, जब इनोवेटिव नजरिया रखेंगे और नठतरीकों à¤à¤µà¤‚ तकनीकों को अपनाà¤à¤‚गे। हमारे देश की आबादी का बड़ा हिसà¥à¤¸à¤¾ कृषकों का है, à¤à¤¸à¥‡ में बिना कृषको की आरà¥à¤¥à¤¿à¤• समà¥à¤ªà¤¨à¥à¤¨à¤¤à¤¾ के हम विकसित देश नहीं बन सकते हैं। आप टà¥à¤°à¥ˆà¤•à¥à¤Ÿà¤°à¤•ारवां पर अनà¥à¤¯ फसलों की खेती की जानकारी के साथ-साथ टà¥à¤°à¥ˆà¤•à¥à¤Ÿà¤° à¤à¤µà¤‚ कृषि यंतà¥à¤°à¥‹à¤‚ की à¤à¥€ जानकारी पà¥à¤°à¤¾à¤ªà¥à¤¤ कर सकते हैं।