à¤à¤¿à¤‚डी की फली के साथ-साथ इसके जड़ à¤à¤µà¤‚ तनें à¤à¥€ आरà¥à¤¥à¤¿à¤• दृषà¥à¤Ÿà¤¿ से महतà¥à¤µà¤ªà¥‚रà¥à¤£ होते हैं, कà¥à¤¯à¥‹à¤‚कि इसकी मांग गà¥à¥œ à¤à¤µà¤‚ शकà¥à¤•र को साफ़ करने के कारà¥à¤¯ के लिठहोती है। इसके साथ ही कà¥à¤› देशों में à¤à¤¿à¤‚डी के बीज का पाउडर बनाकर इसका पà¥à¤°à¤¯à¥‹à¤— कॉफ़ी के रूप में à¤à¥€ किया जाता है। इस पà¥à¤°à¤•ार बहà¥à¤ªà¤¯à¥‹à¤—ी होने की वजह से à¤à¤¿à¤‚डी की à¤à¤¾à¤°à¤¤à¥€à¤¯ बाजार के साथ-साथ विशà¥à¤µ बाजार में à¤à¥€ काफी मांग है, à¤à¤µà¤‚ लागत के हिसाब से इसका बेहतर मूलà¥à¤¯ à¤à¥€ पà¥à¤°à¤¾à¤ªà¥à¤¤ होता है। इस पà¥à¤°à¤•ार यह आरà¥à¤¥à¤¿à¤• दृषà¥à¤Ÿà¤¿ से हमारे लिठमहतà¥à¤µà¤ªà¥‚रà¥à¤£ सबà¥à¤œà¥€ है।
à¤à¤¿à¤‚डी, पोषक ततà¥à¤µà¥‹à¤‚ से à¤à¤°à¤ªà¥‚र सबà¥à¤œà¥€ है, जिसमें खनिज (Ca, Mg, P,K, Zn), विटामिन (A, B1, B2), à¤à¤‚टीओकà¥à¤¸à¤¿à¤¡à¥‡à¤‚ट, à¤à¤µà¤‚ फाइबर पà¥à¤°à¤šà¥à¤° मातà¥à¤°à¤¾ में पाठजाते हैं। विशेषकर यह पेट के लिठà¤à¥€ बहà¥à¤¤ अचà¥à¤›à¤¾ माना जाता है। दो-चार ताज़ी à¤à¤¿à¤‚डी का पà¥à¤°à¤¤à¤¿à¤¦à¤¿à¤¨ सेवन करने से पेट बिलà¥à¤•à¥à¤² साफ़ रहता है।
à¤à¤¿à¤‚डी की खेती के लिठगरम जलवायॠसबसे उपयà¥à¤•à¥à¤¤ होती है। इसकी खेती के लिठऔसत 25°C से 30°C के तापमान को उपयà¥à¤•à¥à¤¤ माना जाता है। जब तापमान 18° से कम हो जाता है, तो इसके बीज का जमाव रà¥à¤• जाता है, इसपà¥à¤°à¤•ार ठंडे मौसम में à¤à¤¿à¤‚डी की फसल की वृदà¥à¤§à¤¿ में रà¥à¤•ावट आ सकती है à¤à¤µà¤‚ उतà¥à¤ªà¤¾à¤¦à¤¨ कम हो सकता है। अधिक नमी इसके लिठअनà¥à¤•ूल होती है, वहीठअतà¥à¤¯à¤§à¤¿à¤• जलà¤à¤°à¤¾à¤µ से इसकी जड़ें सड़ सकती हैं, इसलिठजल निकासी की वà¥à¤¯à¤µà¤¸à¥à¤¥à¤¾ महतà¥à¤µà¤ªà¥‚रà¥à¤£ है।
वैसे तो à¤à¤¿à¤‚डी के लिठउपयà¥à¤•à¥à¤¤ मौसम गà¥à¤°à¥€à¤·à¥à¤®à¤•ाल है, लेकिन इसे गà¥à¤°à¥€à¤·à¥à¤® à¤à¤µà¤‚ वरà¥à¤·à¤¾ दोनों ऋतà¥à¤“ं में उगाया जाता है। गà¥à¤°à¥€à¤·à¥à¤®à¤•ाल में इसकी बà¥à¤†à¤ˆ का सही समय फरवरी-मारà¥à¤š है, वहीठवरà¥à¤·à¤¾à¤•ाल में इसकी बà¥à¤†à¤ˆ का समय जून-जà¥à¤²à¤¾à¤ˆ का माह है। उतà¥à¤¤à¤° à¤à¤¾à¤°à¤¤ में मधà¥à¤¯ à¤à¤¾à¤°à¤¤ के मैदान वाले इलाके में वरà¥à¤· में 2 बार फसल की बà¥à¤†à¤ˆ की जाती है। इन कà¥à¤·à¥‡à¤¤à¥à¤°à¥‹à¤‚ में à¤à¤• बà¥à¤†à¤ˆ वरà¥à¤·à¤¾ ऋतॠयानी जून-जà¥à¤²à¤¾à¤ˆ में की जाती है, à¤à¤µà¤‚ दूसरी बार गà¥à¤°à¥€à¤·à¥à¤® में इसकी बà¥à¤†à¤ˆ फरवरी-मारà¥à¤š में की जाती है। उतà¥à¤¤à¤° à¤à¤¾à¤°à¤¤ में अगेती बà¥à¤†à¤ˆ का काफी पà¥à¤°à¤šà¤²à¤¨ à¤à¤µà¤‚ महतà¥à¤¤à¥à¤µ है। परनà¥à¤¤à¥ बीज वाली फसल की बà¥à¤†à¤ˆ वरà¥à¤·à¤¾ ऋतॠ(10 से 15 जà¥à¤²à¤¾à¤ˆ) में जà¥à¤¯à¤¾à¤¦à¤¾ उपयà¥à¤•à¥à¤¤ होती है। कà¥à¤¯à¥‹à¤‚कि इसके पहले बà¥à¤†à¤ˆ करने से बीज के पकने के समय वरà¥à¤·à¤¾ होने लगती है à¤à¤µà¤‚ फसल को नà¥à¤•सान पहà¥à¤à¤šà¤¤à¤¾ है।
à¤à¤¿à¤‚डी को विà¤à¤¿à¤¨à¥à¤¨ पà¥à¤°à¤•ार की मिटà¥à¤Ÿà¤¿à¤¯à¥‹à¤‚ में उगाया जा सकता है, परनà¥à¤¤à¥ इसके लिठसबसे उपयà¥à¤•à¥à¤¤ हà¥à¤¯à¥‚मस वाली दोमट या बलà¥à¤ˆ दोमट मिटà¥à¤Ÿà¥€ माना जाता है। वहीठमिटà¥à¤Ÿà¥€ का pH 6 से 7 के बीच होनी चाहिà¤à¥¤ à¤à¤¿à¤‚डी की खेती के लिठà¤à¥‚मि के चयन करते समय यह धà¥à¤¯à¤¾à¤¨ देना चाहिà¤, कि मिटà¥à¤Ÿà¥€ जलजमाव वाला ना हो, यानी उचित जल निकासी की वà¥à¤¯à¤µà¤¸à¥à¤¥à¤¾ हो, ताकि पानी रà¥à¤•ने न पाà¤à¥¤
उपयà¥à¤•à¥à¤¤ à¤à¥‚मि के चà¥à¤¨à¤¾à¤µ के बाद आती है मिटà¥à¤Ÿà¥€ की तैयारी की बारी, तो बता दें कि à¤à¤¿à¤‚डी के लिठमिटà¥à¤Ÿà¥€ की तैयारी की कोई विशेष पà¥à¤°à¤•à¥à¤°à¤¿à¤¯à¤¾ नहीं होती है। आपको सामानà¥à¤¯ तरीके से जà¥à¤¤à¤¾à¤ˆ कर मिटà¥à¤Ÿà¥€ को à¤à¥à¤°à¤à¥à¤°à¤¾ बना लेना है। दो-तीन जà¥à¤¤à¤¾à¤ˆ के बाद मिटà¥à¤Ÿà¥€ बीज बà¥à¤†à¤ˆ लायक हो जायेगी, जिसके बाद आपको पाटा लगा कर समतल कर लेना है।
कृषि विजà¥à¤žà¤¾à¤¨ के विकास ने कृषि को उनà¥à¤¨à¤¤ किसà¥à¤®à¥‹à¤‚ का तोहफा दिया है, और ये सिलसिला जारी है। जिससे फसलों की रोग-पà¥à¤°à¤¤à¤¿à¤°à¥‹à¤§à¤• कà¥à¤·à¤®à¤¤à¤¾ की वृदà¥à¤§à¤¿ के साथ-साथ फसल की पैदावार में à¤à¥€ बà¥à¥‹à¤¤à¤°à¥€ की है। à¤à¤¿à¤‚डी की à¤à¥€ कई उनà¥à¤¨à¤¤ à¤à¤µà¤‚ संकर किसà¥à¤®à¥‡à¤‚ आज मारà¥à¤•ेट में उपलबà¥à¤§ है, आइये जानते हैं उन किसà¥à¤®à¥‹à¤‚ के बारे में-
काशी पà¥à¤°à¤—ति (वी.आर.ओ.-6)- यह बीज पितà¥à¤¤ शिरा मोजैक à¤à¤µà¤‚ पतà¥à¤¤à¥€ के शà¥à¤°à¥‚आती विकास के समय लगने वाले पतà¥à¤¤à¥€ मोड़ विषाणॠका पà¥à¤°à¤¤à¤¿à¤°à¥‹à¤§à¥€ है। बà¥à¤†à¤ˆ के 38 से 40 दिनों के बाद फूल चौथे से छठे गाà¤à¤ पर आ जाता है। गà¥à¤°à¥€à¤·à¥à¤® काल में इसकी पà¥à¤°à¤¤à¤¿ हेकà¥à¤Ÿà¥‡à¤¯à¤° उपज 135 कà¥à¤‚तल à¤à¤µà¤‚ वरà¥à¤·à¤¾ ऋतॠमें 180 कà¥à¤‚तल होती है।
काशी विà¤à¥‚ति (वी.आर.ओ.-5)- यह à¤à¤¿à¤‚डी की बेहतर पैदावार वाली à¤à¤• बौनी पà¥à¤°à¤œà¤¾à¤¤à¤¿ है, जिसकी बà¥à¤¤ केवल 60 से 70 सेमी तक होती है। इसमें चौथे गांठपर फूल 40 दिनों में आ जाते हैं। वरà¥à¤·à¤¾à¤•ाल में बोई गयी फसल की पà¥à¤°à¤¤à¤¿ हेकà¥à¤Ÿà¥‡à¤¯à¤° पैदावार 150 कà¥à¤‚तल à¤à¤µà¤‚ गरà¥à¤®à¥€ के मौसम में 120 कà¥à¤‚तल होती है। यह पितà¥à¤¤ शिरा मोजैक à¤à¤µà¤‚ इनेसन विषाणॠरोग का पà¥à¤°à¤¤à¤¿à¤°à¥‹à¤§à¥€ किसà¥à¤® है।
काशी सातधारी (आई.आई.वी.आर.-10)- यह बीज à¤à¥€ पितà¥à¤¤ शिरा मोजैक à¤à¤µà¤‚ पतà¥à¤¤à¥€ के शà¥à¤°à¥‚आती विकास के समय लगने वाले पतà¥à¤¤à¥€ मोड़ विषाणॠका पà¥à¤°à¤¤à¤¿à¤°à¥‹à¤§à¥€ है। बà¥à¤†à¤ˆ के 42 दिन बाद इसके पौधे में फूल आजाते हैं। वरà¥à¤·à¤¾ ऋतॠके लिठयह बेसà¥à¤Ÿ सीड है, जिसकी पà¥à¤°à¤¤à¤¿ हेकà¥à¤Ÿà¥‡à¤¯à¤° पैदावार 140 कà¥à¤‚तल तक जा सकती है।
काशी कà¥à¤°à¤¾à¤‚ति- यह पितà¥à¤¤ शिरा मौजेक विषाणॠà¤à¤µà¤‚ ओ.à¤à¤².सी.वी. पà¥à¤°à¤¤à¤¿à¤°à¥‹à¤§à¥€ है। इस बीज की पैदावार 125 से 140 कà¥à¤‚तल पà¥à¤°à¤¤à¤¿ हेकà¥à¤Ÿà¥‡à¤¯à¤° होती है।
इसके साथ ही पूसा सावनी, परà¤à¤¨à¥€ कà¥à¤°à¤¾à¤‚ति, अरà¥à¤•ा अनामिका, पंजाब पदà¥à¤®à¤¿à¤¨à¥€, अरà¥à¤•ा अà¤à¤¯, वरà¥à¤·à¤¾ उपहार जैसे à¤à¤¿à¤‚डी की कई उनà¥à¤¨à¤¤ किसà¥à¤®à¥‡à¤‚ उपलबà¥à¤§ है।
सारिका, काशी à¤à¥ˆà¤°à¤µ, सिंजेंटा-152, महिको 8888, यू.à¤à¤¸.-7109, à¤à¤¸-5, जे.के. हरिता आदि संकर किसà¥à¤®à¥‡à¤‚ हैं, जो पितà¥à¤¤ शिरा विषाणॠरोग पà¥à¤°à¤¤à¤¿à¤°à¥‹à¤§à¥€ संकर किसà¥à¤®à¥‡à¤‚ हैं।
यदि à¤à¤¿à¤‚डी की खेती को अधिक उतà¥à¤ªà¤¾à¤¦à¤• बनाना है, तो इसमें गोबर की खाद à¤à¤µà¤‚ उरà¥à¤µà¤°à¤• का उपयà¥à¤•à¥à¤¤ मातà¥à¤°à¤¾ में पà¥à¤°à¤¯à¥‹à¤— करना चाहिà¤à¥¤ खाद के पà¥à¤°à¤¯à¥‹à¤— के पहले किसानों को सलाह है कि वे अपने नजदीकी साइल टेसà¥à¤Ÿà¤¿à¤‚ग सेंटर में मिटà¥à¤Ÿà¥€ की उरà¥à¤µà¤°à¤¤à¤¾ की जांच करा लें, जिसके बाद आप अमà¥à¤• पोषक ततà¥à¤µ की कमी के अनà¥à¤¸à¤¾à¤° उपयà¥à¤•à¥à¤¤ उरà¥à¤µà¤°à¤• का पà¥à¤°à¤¯à¥‹à¤— कर पाà¤à¤‚गे। आसपास मिटà¥à¤Ÿà¥€ जाà¤à¤š की सà¥à¤µà¤¿à¤§à¤¾ उपलबà¥à¤§ ना होने की सà¥à¤¥à¤¿à¤¤à¤¿ में किसान साधारण मिटà¥à¤Ÿà¥€ में पà¥à¤°à¤¤à¤¿ हेकà¥à¤Ÿà¥‡à¤¯à¤° की दर से 20-25 टन सड़ी गोबर की खाद, 100 किलोगà¥à¤°à¤¾à¤® नाइटà¥à¤°à¥‹à¤œà¤¨, 50 किलोगà¥à¤°à¤¾à¤® फासà¥à¤«à¥‹à¤°à¤¸, à¤à¤µà¤‚ 50 किलो गà¥à¤°à¤¾à¤® पोटाश का पà¥à¤°à¤¯à¥‹à¤— करना चाहिà¤à¥¤
उलà¥à¤²à¥‡à¤–नीय है कि मातà¥à¤°à¤¾ के साथ-साथ किसान à¤à¤¾à¤‡à¤¯à¥‹à¤‚ को उपयà¥à¤•à¥à¤¤ तरीके से उरà¥à¤µà¤°à¤• के पà¥à¤°à¤¯à¥‹à¤— की à¤à¥€ जानकारी होनी आवशà¥à¤¯à¤• है। तो आइये जानते हैं कब à¤à¤µà¤‚ कैसे करें खाद/उरà¥à¤µà¤°à¤• का पà¥à¤°à¤¯à¥‹à¤—-
बीज की उपयà¥à¤•à¥à¤¤ मातà¥à¤°à¤¾ का जà¥à¤žà¤¾à¤¨ होना अति-आवशà¥à¤¯à¤• है। à¤à¤¿à¤‚डी के बीज की मातà¥à¤°à¤¾ बà¥à¤†à¤ˆ के समय à¤à¤µà¤‚ कितनी दूरी पर पौधे को बोना है इसपर निरà¥à¤à¤° करता है। वरà¥à¤·à¤¾ ऋतॠयानी खरीफ के मौसम में बà¥à¤†à¤ˆ के लिठपà¥à¤°à¤¤à¤¿ हेकà¥à¤Ÿà¥‡à¤¯à¤° 8 से 10 किलोगà¥à¤°à¤¾à¤® à¤à¤µà¤‚ गà¥à¤°à¥€à¤·à¥à¤®à¤•ाल में 12 से 15 किलोगà¥à¤°à¤¾à¤® बीज की जरà¥à¤°à¤¤ होती है। जबकि फरवरी के पà¥à¤°à¤¥à¤® सपà¥à¤¤à¤¾à¤¹ यानी अगेती बà¥à¤†à¤ˆ के लिठ15 से 20 किलोगà¥à¤°à¤¾à¤® बीज की आवशà¥à¤¯à¤•ता होती है।
à¤à¤¿à¤‚डी की बीज की बà¥à¤†à¤ˆ खेतों में कà¥à¤¯à¤¾à¤°à¤¿à¤¯à¤¾à¤‚ या मेड़ो को बनाकर की जाती है। जहाठजल निकास उपयà¥à¤•à¥à¤¤ नहीं हो वहां मेड़ बनाकर उसपर बà¥à¤†à¤ˆ की जाती है। गà¥à¤°à¥€à¤·à¥à¤®à¤•ाल में अगेती फसल के लिठबà¥à¤†à¤ˆ से पूरà¥à¤µ बीज को 24 घंटे तक पानी में à¤à¤¿à¤‚गोकर रखनी चाहिà¤, उसके बाद कà¥à¤› देर तक छाà¤à¤µ में सà¥à¤–जाने के बाद बà¥à¤†à¤ˆ करनी चाहिà¤à¥¤ इसके साथ ही बà¥à¤†à¤ˆ के पूरà¥à¤µ कैपà¥à¤Ÿà¤¾à¤« या थिरम नामक कवकनाशी दवा की 2.5 से 3.0 गà¥à¤°à¤¾à¤® मातà¥à¤°à¤¾ को पà¥à¤°à¤¤à¤¿à¤•िलो गà¥à¤°à¤¾à¤® बीज की मातà¥à¤°à¤¾ के साथ मिलाकर बीज का उपचार कर लेना चाहिà¤à¥¤ बीज की बà¥à¤†à¤ˆ 2.5 से 3.0 सेमी की गहराई पर की जाती है।
यदि बीज के अंकà¥à¤°à¤£ के समय मिटà¥à¤Ÿà¥€ में उपयà¥à¤•à¥à¤¤ नमी ना हो, तो à¤à¤• हलà¥à¤•ी सिचाई कर देनी चाहिठताकि नमी बरकरार रह सके à¤à¤µà¤‚ बीज का सवसà¥à¤¥ अंकà¥à¤°à¤£ संà¤à¤µ हो सके। बाद में, मिटà¥à¤Ÿà¥€ के पà¥à¤°à¤•ार à¤à¤µà¤‚ मौसम के आधार पर सिंचाई करनी चाहिà¤à¥¤ मारà¥à¤š महीने में सिंचाई 10 से 12 दिन, अपà¥à¤°à¥ˆà¤² महीने से 7 से 8 दिन, à¤à¤µà¤‚ मई-जून में 4 से 5 दिन के अनà¥à¤¤à¤°à¤¾à¤² में करनी चाहिà¤à¥¤ उलà¥à¤²à¥‡à¤–नीय है कि ये बतायी गयी मातà¥à¤°à¤¾ मौसम के मिजाज à¤à¤µà¤‚ मिटà¥à¤Ÿà¥€ में पानी के सà¥à¤¤à¤° पर निरà¥à¤à¤° करती है। à¤à¤¿à¤‚डी की खेती के लिठआप डà¥à¤°à¤¿à¤ª इरिगेशन विधि को à¤à¥€ अपना सकते हैं। इससे पानी की बचत होती है à¤à¤µà¤‚ पौधों को परà¥à¤¯à¤¾à¤ªà¥à¤¤ नमी à¤à¥€ मिलती है।
à¤à¤¿à¤‚डी की फसल लगने के 25 से 30 दिनों के बाद अनेक खरपतवार उग आते हैं, जो फसल को सà¥à¤µà¤¸à¥à¤¥ विकास के लिठआवशà¥à¤¯à¤• पोषक ततà¥à¤µ पà¥à¤°à¤¾à¤ªà¥à¤¤ करने में रूकावट डालते हैं। सà¥à¤µà¤¸à¥à¤¥ फसल à¤à¤µà¤‚ बेहतर उतà¥à¤ªà¤¾à¤¦à¤¨ पà¥à¤°à¤¾à¤ªà¥à¤¤ करने के लिठइनका समय रहते नियंतà¥à¤°à¤£ करना आवशà¥à¤¯à¤• है। खरपतवार के नियंतà¥à¤°à¤£ के लिठपà¥à¤°à¤¤à¤¿ डà¥à¤¯à¥à¤…ल (मेटा लेकà¥à¤²à¥‹à¤° -50 ई.सी.) की 2 लीटर मातà¥à¤°à¤¾ या सà¥à¤Ÿà¤¾à¤®à¥à¤ª (पेंडीमेथलीन 30 ई.सी.) की 3.3 लीटर दवा की मातà¥à¤°à¤¾ 1000 लीटर पानी में घोलकर पà¥à¤°à¤¤à¤¿ हेकà¥à¤Ÿà¥‡à¤¯à¤° की दर से बà¥à¤†à¤ˆ के 48 के अनà¥à¤¦à¤° छिडकाव करना चाहिà¤à¥¤ यह खरपतवार नियंतà¥à¤°à¤£ का à¤à¤• पà¥à¤°à¤à¤¾à¤µà¥€ उपाय है।
à¤à¤¿à¤‚डी में लगने वाले पà¥à¤°à¤®à¥à¤– कीट à¤à¤µà¤‚ उनके नियंतà¥à¤°à¤£ के उपाय नीचे बताये जा रहे हैं-
फà¥à¤¦à¤•ा (जैसिड)- यह गà¥à¤°à¥€à¤·à¥à¤®à¤•ाल में बोई गयी फसलों को अधिक नà¥à¤•सान पहà¥à¤‚चाता है। ये पतà¥à¤¤à¥€ के निचली सतह से रस चूसते हैं à¤à¤µà¤‚ à¤à¤• जहरीला पदारà¥à¤¥ अपने लार के साथ पतà¥à¤¤à¥€ के अंदर इंजेकà¥à¤Ÿ करते हैं, जिसके कारण पतà¥à¤¤à¥€ किनारे से सिकà¥à¥œà¤¨à¥‡ लगती है, à¤à¤µà¤‚ इसका रंग पीला पड़ जाता है।
इसके नियंतà¥à¤°à¤£ के लिठबà¥à¤†à¤ˆ के वक़à¥à¤¤ इमिडाकà¥à¤²à¥‹à¤ªà¥à¤°à¤¿à¤¡ 48 à¤à¤«à¤à¤¸ की 5 से 9 मिली/पà¥à¤°à¤¤à¤¿ गà¥à¤°à¤¾à¤® बीज या इमिडाकà¥à¤²à¥‹à¤ªà¥à¤°à¤¿à¤¡ 70 डबà¥à¤²à¥à¤¯à¥‚à¤à¤¸ की 5 से 10 गà¥à¤°à¤¾à¤®/पà¥à¤°à¤¤à¤¿ किलोगà¥à¤°à¤¾à¤® बीज की दर से बीज का उपचार करना चाहिà¤à¥¤
सफ़ेद मकà¥à¤–ी- यह सफ़ेद रंग का छोटे आकर का कीट होता है, जिसका पूरा शरीर मोम से ढका होता है। ये पतà¥à¤¤à¤¿à¤¯à¥‹à¤‚ का रस-चूसते हैं à¤à¤µà¤‚ विषाणॠरोग से पौधे को संकà¥à¤°à¤®à¤¿à¤¤ करते हैं।
इसके नियंतà¥à¤°à¤£ के लिठफà¥à¤¦à¤•ा के नियंतà¥à¤°à¤£ के लिठबतायी गयी पà¥à¤°à¤•à¥à¤°à¤¿à¤¯à¤¾ से बà¥à¤†à¤ˆ के पूरà¥à¤µ बीज का उपचार करें।
तना à¤à¤µà¤‚ फल छेदक कीट- वरà¥à¤·à¤¾à¤•ाल वाली फसल को ये जà¥à¤¯à¤¾à¤¦à¤¾ पà¥à¤°à¤à¤¾à¤µà¤¿à¤¤ करते हैं। ये तना के अगले à¤à¤¾à¤— à¤à¤µà¤‚ फली में छेद कर उसे अपना आहार बनाते हैं। इससे तना मà¥à¤°à¤à¤¾ जाते हैं à¤à¤µà¤‚ फली खाने लायक नहीं रह जाता है।
इससे बचाव के लिठगरà¥à¤®à¥€ के मौसम में मिटà¥à¤Ÿà¥€ की गहरी जà¥à¤¤à¤¾à¤ˆ करनी चाहिà¤à¥¤ जिस तने या फली पर इस कीट का आकà¥à¤°à¤®à¤£ हà¥à¤† हो, उसे पूरी तरह से तोड़कर हटा देना चाहिà¤à¥¤ इससे बचाव के लिठजैव कीटनाशक बैसिलस थà¥à¤°à¤¿à¤¨à¤œà¤¿à¤¨à¥‡à¤¸à¤¿à¤¸ (बी.टी.) 0.5 गà¥à¤°à¤¾à¤® की मातà¥à¤°à¤¾/हेकà¥à¤Ÿà¥‡à¤¯à¤° की दर से 1 हफà¥à¤¤à¥‡ के अंतराल पर 2 से 3 बार छिडकाव करना चाहिà¤à¥¤
पीत शिरा मोजैक- यह à¤à¤• विषाणà¥à¤œà¤¨à¤¿à¤¤ रोग है, जिसके फैलने से पौधे का विकास रà¥à¤• जाता है à¤à¤µà¤‚ पतà¥à¤¤à¤¿à¤¯à¤¾à¤‚ à¤à¤µà¤‚ तने पीले पड़कर सूखने लगते हैं।
इसके नियंतà¥à¤°à¤£ के लिठमेटासिसà¥à¤Ÿà¥‹à¤• या नà¥à¤†à¤•à¥à¤°à¤¾à¤¨ कीटनाशक की 1.5 मिली लीटर मातà¥à¤°à¤¾ पà¥à¤°à¤¤à¤¿ लीटर पानी में घोलकर 15 दिन के गैप में 3 बार छिडकाव करना चाहिà¤à¥¤
काला धबà¥à¤¬à¤¾- यह रोग सितंबर के अंतिम सपà¥à¤¤à¤¾à¤¹ से फैलना शà¥à¤°à¥‚ होता है, à¤à¤µà¤‚ कम तापमान à¤à¤µà¤‚ अधिक आरà¥à¤¦à¥à¤°à¤¤à¤¾ होने पर तेजी से बà¥à¤¤à¤¾ जाता है।
इसके नियंतà¥à¤°à¤£ के लिठ1 गà¥à¤°à¤¾à¤® टापसिन à¤à¤® या 0.5 गà¥à¤°à¤¾à¤® बेयकà¥à¤° की मातà¥à¤°à¤¾ को पà¥à¤°à¤¤à¤¿ लीटर पानी में घोलकर धबà¥à¤¬à¥‡ दिखाई देने पर छिडकाव करें। इसका छिडकाव 8 से 10 दिन के अंतराल पर 2 से 3 बार करनी चाहिà¤à¥¤
सूखा व जड़ गलन रोग- यह मिटà¥à¤Ÿà¥€ के फफूंद से फैलने वाला रोग है। इसके संकà¥à¤°à¤®à¤£ से पौधे पीले पड़ जाते हैं à¤à¤µà¤‚ बाद में सूख जाते हैं।
फसल चकà¥à¤° को अपनाकर à¤à¤µà¤‚ बीजोपचार कर इसपर नियंतà¥à¤°à¤£ पà¥à¤°à¤¾à¤ªà¥à¤¤ किया जा सकता है।
चूरà¥à¤£à¥€ फफूंद रोग- इस रोग के फैलने पर पतà¥à¤¤à¤¿à¤¯à¥‹à¤‚ पर गहरे à¤à¥‚रे रंग का चूरà¥à¤£ बन जाता है। जिससे बाद में पतà¥à¤¤à¤¿à¤¯à¤¾à¤‚ सिकà¥à¥œà¤•र मà¥à¤°à¤à¤¾ जाती है।
इसके नियंतà¥à¤°à¤£ के लिठमाइकà¥à¤²à¥‹ बà¥à¤²à¥‚टानिल 1 गà¥à¤°à¤¾à¤® पà¥à¤°à¤¤à¤¿ लीटर की दर से छिडकाव करना चाहिà¤à¥¤
à¤à¤¿à¤‚डी का फल जब हरा, ताजगी से à¤à¤°à¤¾ à¤à¤µà¤‚ आकार में सही होता है, तब उसे तोड़ लेना चाहिà¤à¥¤ बीज के पà¥à¤°à¤•ार के हिसाब से à¤à¤¿à¤‚डी के फल के परिपकà¥à¤µ होने के समय में अंतर हो सकता है। सामानà¥à¤¯à¤¤: à¤à¤¿à¤‚डी की फसल 50-60 दिनों में तैयार हो जाती है। नियमित रूप से फल तोड़ने से नठफूल à¤à¤µà¤‚ फल आने की पà¥à¤°à¤•à¥à¤°à¤¿à¤¯à¤¾ बनी रहती है। फलों को हाथ से हलके से तोड़ा जाना चाहिà¤, ताकि पौधों को कोई नà¥à¤•सान न हो।
à¤à¤¿à¤‚डी की अचà¥à¤›à¥€ फसल को अचà¥à¤›à¥€ कीमत पर बेचना महतà¥à¤µà¤ªà¥‚रà¥à¤£ है। उतà¥à¤ªà¤¾à¤¦à¤¨ के बाद फसल को ताजे à¤à¤µà¤‚ साफ तरीके से बाजार में à¤à¥‡à¤œà¤¨à¥‡ के लिठपैकिंग और टà¥à¤°à¤¾à¤‚सपोरà¥à¤Ÿà¥‡à¤¶à¤¨ की अचà¥à¤›à¥€ वà¥à¤¯à¤µà¤¸à¥à¤¥à¤¾ करनी चाहिà¤à¥¤ à¤à¤¿à¤‚डी की बाजार में मांग हमेशा बनी रहती है, खासकर शहरी कà¥à¤·à¥‡à¤¤à¥à¤°à¥‹à¤‚ में।
हमनें इस आरà¥à¤Ÿà¤¿à¤•ल में à¤à¤¿à¤‚डी की खेती करने की पूरी पà¥à¤°à¤•à¥à¤°à¤¿à¤¯à¤¾ को बताया है। हमारा उदेशà¥à¤¯ किसानों को à¤à¤¿à¤‚डी की वैजà¥à¤žà¤¾à¤¨à¤¿à¤• à¤à¤µà¤‚ उनà¥à¤¨à¤¤ खेती की तरीके की जानकारी देना है, ताकि वे घरेलू खपत के लिठउतà¥à¤ªà¤¾à¤¦à¤¨ करने के साथ-साथ à¤à¤¿à¤‚डी के निरà¥à¤¯à¤¾à¤¤ में à¤à¥€ अपनी हिसà¥à¤¸à¥‡à¤¦à¤¾à¤°à¥€ दे सकें। à¤à¤¿à¤‚डी की वैजà¥à¤žà¤¾à¤¨à¤¿à¤• खेती को अपनाकर किसान न केवल अपनी फसल की गà¥à¤£à¤µà¤¤à¥à¤¤à¤¾ बढ़ा सकते हैं, बलà¥à¤•ि उतà¥à¤ªà¤¾à¤¦à¤¨ में à¤à¥€ वृदà¥à¤§à¤¿ कर सकते हैं। उचित जलवायà¥, उरà¥à¤µà¤°à¤•, सिंचाई, कीट नियंतà¥à¤°à¤£, और सही मारà¥à¤•ेटिंग सà¥à¤Ÿà¥à¤°à¥‡à¤Ÿà¥‡à¤œà¥€ के साथ à¤à¤¿à¤‚डी की खेती à¤à¤• लाà¤à¤•ारी वà¥à¤¯à¤µà¤¸à¤¾à¤¯ साबित हो सकता है। अगर इन सà¤à¥€ उपायों को सही तरीके से अपनाया जाà¤, तो यह फसल किसानों के लिठà¤à¤• सà¥à¤°à¤•à¥à¤·à¤¿à¤¤ à¤à¤µà¤‚ टिकाऊ आय का सà¥à¤°à¥‹à¤¤ बन सकती है।